बाल्यकाल — वशिष्ठ से विश्वामित्र तक
चारों राजकुमार गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल में विद्या पाकर लौटे ही थे कि एक दिन अयोध्या के द्वार पर तेजस्वी विश्वामित्र आ खड़े हुए — माँग चौंकाने वाली: यज्ञ-रक्षा के लिए मुझे राम चाहिए। दशरथ काँप गए — सोलह वर्ष से कम का पुत्र, और सामने ताड़का-सुबाहु जैसे निशाचर! पर वशिष्ठ की सम्मति से राम-लक्ष्मण गुरु के साथ चले। यह प्रस्थान राम-चरित्र का पहला सूत्र है — आज्ञा-पालन; और विश्वामित्र-संग उनका पहला विद्यालय: मार्ग में बला-अतिबला विद्याएँ, दिव्यास्त्र, और वह पहला धर्म-निर्णय जब गुरु की आज्ञा पर उन्होंने ताड़का का वध किया — स्त्री-वध के संकोच पर गुरु का उत्तर था: प्रजा-पीड़क के लिए लिंग-विचार नहीं, धर्म-विचार होता है। यज्ञ पूर्ण हुआ; मारीच समुद्र-पार फेंका गया (वही मारीच, जो वर्षों बाद स्वर्ण-मृग बनेगा — कथा के धागे दूर तक जाते हैं)।
मिथिला-मार्ग पर वह प्रसंग आया जो करुणा-परंपरा का रत्न है — अहल्या-उद्धार: गौतम ऋषि के शाप से जड़वत् हुई अहल्या राम के चरण-स्पर्श से मुक्त हुईं। रामकथा की यह घोषणा है कि राम जहाँ जाते हैं, वहाँ ठहरी हुई नियति फिर चलने लगती है।
धनुष-भंग और विवाह
मिथिला में जनक की प्रतिज्ञा थी — जो शिव-धनुष (पिनाक) चढ़ा दे, वही सीता का वर। बड़े-बड़े वीर धनुष हिला तक न सके थे। गुरु-आज्ञा पाकर राम उठे — और परंपरा कहती है कि धनुष चढ़ाते-चढ़ाते टूट गया; टंकार तीनों लोकों में गूँजी। सीता — जनक की याज्ञसेनी पुत्री, भूमि से प्रकट भूमिजा — ने वरमाला पहनाई। इसी टंकार पर परशुराम आए, और एक अवतार ने दूसरे को पहचानकर मार्ग दिया (वह प्रसंग परशुराम-पृष्ठ पर)। चारों भाइयों के विवाह जनक-कुल की कन्याओं से हुए — अयोध्या आनंद में डूब गई।
वनवास — वचन की कीमत
वर्षों बाद दशरथ ने राम के राज्याभिषेक की घोषणा की — और उसी रात मंथरा की मति से प्रेरित कैकेयी ने अपने दो पुराने वरदान माँग लिए: भरत को राज्य, राम को चौदह वर्ष का वनवास। यहाँ राम-चरित्र का शिखर-क्षण है। न विद्रोह, न विलाप, न एक भी कटु वाक्य — पिता का वचन रहे, इसके लिए राजमुकुट के स्थान पर वल्कल; और चलते समय कैकेयी के प्रति भी वही विनय। सीता ने महलों पर वन चुना — पत्नी-धर्म की अपनी मर्यादा से; लक्ष्मण ने सेवा चुनी। दशरथ पुत्र-वियोग में चल बसे — श्रवणकुमार-प्रसंग का पुराना शाप पूरा हुआ।
और तब आया वह चरित्र जो त्याग की भी परीक्षा ले ले — भरत। ननिहाल से लौटे भरत ने माता का किया धिक्कारा, सिंहासन ठुकराया, और चित्रकूट जाकर राम से लौटने की प्रार्थना की। राम ने पिता-वचन की मर्यादा समझाई; भरत राम की चरण-पादुकाएँ सिंहासन पर रखकर नंदिग्राम में तपस्वी-वेश में चौदह वर्ष राज्य की धरोहर सँभालते रहे। संसार सिंहासन के लिए भाइयों को लड़ते देखता आया था — रामकथा में भाई सिंहासन "मत लो, तुम लो" के लिए विनती करते हैं। यही इस कथा की क्रांति है।
वन-यात्रा स्वयं एक सत्संग-यात्रा बनी — निषादराज गुह का आलिंगन, केवट का प्रेम-आग्रह, चित्रकूट-दंडक के ऋषि-आश्रम, अत्रि-अनसूया का आशीर्वाद। रामकथा की यह धारा घोषित करती है कि मर्यादा का अर्थ ऊँच-नीच नहीं — हर व्यक्ति को उसका सम्मान देना है।
पंचवटी — हरण और विलाप
वनवास के अंतिम वर्षों में गोदावरी-तट की पंचवटी निवास बनी। वहीं रावण-भगिनी शूर्पणखा आई — प्रणय-प्रस्ताव, अस्वीकार, सीता पर झपट, और लक्ष्मण द्वारा नाक-कान विच्छेदन (परंपरा-धाराओं में विवरण-भेद सहित)। प्रतिशोध की यह चिंगारी खर-दूषण के चौदह सहस्र निशाचरों के अंत से होती हुई लंका तक पहुँची। रावण ने बल से नहीं, छल से उत्तर दिया — मामा मारीच को स्वर्ण-मृग बनने को विवश किया। सीता का मन उस माया-मृग पर आ गया; राम उसके पीछे गए; मरते मारीच ने राम-स्वर में "हा लक्ष्मण" पुकारा; सीता के आग्रह पर लक्ष्मण को जाना पड़ा — और उस सूने क्षण में भिक्षु-वेशी रावण ने सीता-हरण कर लिया। (लोक-प्रसिद्ध "लक्ष्मण-रेखा" मुख्यतः परवर्ती/लोक पाठों की देन है — वाल्मीकि की मुख्य धारा में वह इस रूप में नहीं आती; यह पाठ-भेद जानने योग्य है।)
मार्ग में वृद्ध गिद्धराज जटायु ने प्राण देकर रोका — राम ने उस पक्षी का पुत्रवत् अंतिम संस्कार किया: रामकथा में सेवा की कोई देह छोटी नहीं। खोज में भटकते राम शबरी के आश्रम पहुँचे — भीलनी की प्रतीक्षा और (लोक-परंपरा में) चखे हुए बेरों का प्रेम; राम ने वहाँ नवधा भक्ति का उपदेश दिया। शबरी ने ही मार्ग दिखाया — ऋष्यमूक की ओर।
किष्किंधा — मित्रता और वह कठिन प्रश्न
ऋष्यमूक पर हनुमान से भेंट हुई — ब्राह्मण-वेश में परीक्षा लेते हनुमान राम की वाणी से ही पहचान गए कि यह कोई साधारण वनवासी नहीं; वह भेंट भक्ति-परंपरा का महाद्वार बनी। हनुमान ने सुग्रीव से मैत्री कराई — अग्नि-साक्षी मित्रता: सुग्रीव की पत्नी-राज्य लौटाने का वचन, बदले में सीता-खोज का।
यहीं आता है रामकथा का सबसे विमर्श-योग्य प्रसंग — बाली-वध। महाबली बाली ने भाई सुग्रीव को गलतफ़हमी से शत्रु मान निर्वासित किया था और उसकी पत्नी रख ली थी। राम ने सुग्रीव-बाली द्वंद्व में वृक्ष-ओट से बाण चलाया। मरते बाली ने प्रश्न उठाए — मैंने आपका क्या बिगाड़ा था? सम्मुख युद्ध क्यों नहीं? यह क्षत्रिय-धर्म कैसा? राम का उत्तर परंपरा में बहुस्तरीय है — छोटे भाई की पत्नी का हरण अनुज-वधू के धर्म का हनन है और दंडनीय; राजा (भरत के प्रतिनिधि रूप में) धर्म-दंड का अधिकारी है; और शाखामृग-न्याय (आखेट-मर्यादा) की तत्कालीन दृष्टि। बाली ने उत्तर स्वीकार कर पुत्र अंगद को राम-चरणों में सौंपा। दोनों पक्ष ईमानदारी से कहने योग्य हैं — परंपरा स्वयं इस प्रसंग पर सदियों से मंथन करती आई है; तुलसी ने इसे भक्ति-दृष्टि से देखा, अन्य धाराओं ने नीति-दृष्टि से प्रश्न जीवित रखे। रामकथा की महानता यह है कि वह अपने नायक से भी प्रश्न पूछने की जगह देती है — आस्था और विमर्श साथ-साथ।
सेतु और लंका-युद्ध
हनुमान ने शत-योजन सागर लाँघकर लंका में सीता की खोज की — अशोक-वाटिका में मुद्रिका दी, लंका-दहन कर लौटे। सागर-तट पर रावण का त्यागा भाई विभीषण शरण आया — मंत्रियों के संदेह पर राम का उत्तर शरणागत-वत्सलता का शिखर है: जो शरण आए, उसे अभय — यह मेरा व्रत है। सेतु-बंध हुआ — नल-नील के हाथों तैरते शिला-खंड, वानर-भालुओं और गिलहरी तक का श्रम: महासंकल्प में हर छोटा योगदान पूज्य है। रामेश्वरम् की परंपरा कहती है कि सेतु से पूर्व राम ने शिव-पूजन किया — विजय-यात्रा पर निकला अवतार भी विनम्रता से बल पाता है।
लंका-युद्ध महाकाव्य का चरम है — अंगद का शांति-दूत प्रयास विफल; फिर कुंभकर्ण, मेघनाद (इंद्रजित) जैसे महारथियों के प्रसंग; शक्ति-प्रहार से मूर्च्छित लक्ष्मण और संजीवनी हेतु द्रोणगिरि उठा लाते हनुमान — सेवा की वह मूर्ति जो असंभव शब्द नहीं जानती। अंततः राम-रावण का महासंग्राम: अगस्त्य-प्रदत्त आदित्यहृदय-परंपरा का बल, और नाभि-अमृत के भेदन से रावण का अंत। मरते रावण से राम ने लक्ष्मण को नीति-ज्ञान लेने भेजा — शत्रु की विद्या का भी आदर: यही राम-मर्यादा है। लंका का राज्य विभीषण को मिला — स्वर्ण-नगरी का लोभ नहीं; परंपरा-प्रसिद्ध भाव यही है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर हैं।
अयोध्या-वापसी और रामराज्य
चौदह वर्ष पूर्ण कर पुष्पक से अयोध्या-आगमन — दीपावली की लोक-परंपरा उसी दीपोत्सव की स्मृति मानी जाती है; विजयादशमी रावण-विजय की। भरत से मिलन का दृश्य भक्ति-साहित्य का सबसे भीगा पन्ना है। राज्याभिषेक हुआ — और फिर वह शासन जिसका नाम ही आदर्श बन गया: रामराज्य — जहाँ दंड से पहले करुणा, वैभव से पहले न्याय; जहाँ राजा प्रजा की कसौटी पर स्वयं को सबसे कठोर तराजू में तौले। हनुमान राम-सेवा में अमर हुए — परंपरा कहती है, जहाँ रामकथा है, वहाँ हनुमान हैं।
उत्तरकांड — संयत दृष्टि से
रामकथा के उत्तर-अध्याय (लोकापवाद पर सीता का वन-प्रेषण, वाल्मीकि-आश्रम में लव-कुश का जन्म, अश्वमेध-प्रसंग, सीता का भूमि-प्रवेश, और अंत में राम का सरयू-प्रस्थान) परंपरा के सबसे मार्मिक और सबसे विमर्शित पृष्ठ हैं। यहाँ ईमानदार सूचना आवश्यक है — उत्तरकांड की पाठ-स्थिति पर विद्वानों में मत-भेद है: अनेक विद्वान इसे वाल्मीकि-रामायण के मूल छह कांडों के बाद की संवर्धित रचना मानते हैं; रामचरितमानस इन प्रसंगों को इस रूप में नहीं दोहराता; विभिन्न क्षेत्रीय रामायणों में भी ये भिन्न-भिन्न हैं। जो परंपराएँ इन्हें मानती हैं, वे इनमें राजा के कठोरतम कर्तव्य-द्वंद्व (व्यक्तिगत सुख बनाम लोक-अनुशासन) की त्रासदी पढ़ती हैं; और सीता का चरित्र इन अध्यायों में और ऊँचा होकर निकलता है — गरिमा, धैर्य और अंतिम आत्म-निर्णय की मूर्ति। हम कोई एक पाठ "अंतिम" घोषित नहीं करते — श्रद्धा और प्रश्न, दोनों को परंपरा ने सदा साथ रखा है।
(यह भी स्मरण रहे — वाल्मीकि रामायण आदि-काव्य है; तुलसीदास का रामचरितमानस भक्ति-काल की अवधी रचना, जिसकी दृष्टि और प्रसंग-चयन अपने हैं; कम्बन की तमिल कम्बरामायणम्, कृत्तिवास की बांग्ला, एषुत्तच्छन की मलयालम — हर भाषा की अपनी रामायण-छटा है। ये एक ही पाठ नहीं, एक ही राम के अनेक दर्पण हैं।)
भ्रातृ-धर्म के चार रंग
रामकथा को "भाइयों की कथा" कहकर भी पढ़ा जा सकता है — चारों भाई भ्रातृ-धर्म के चार भिन्न रंग हैं। लक्ष्मण सेवा का रंग हैं — चौदह वर्ष छाया बनकर चलना, निद्रा-सुख तक त्यागने की परंपरा-कथा; उनका क्रोध भी राम-सेवा में ही तपता है। भरत त्याग का रंग — सिंहासन पाकर ठुकराना, और पादुका को स्वामी मानकर स्वयं सेवक-वेश में रहना। शत्रुघ्न मौन कर्तव्य का रंग — बिना यश माँगे अयोध्या और भरत की सेवा; परंपरा उन्हें "भरत के लक्ष्मण" कहती है। और स्वयं राम — जो बड़े होकर भी भाइयों के प्रेम के आगे बार-बार झुकते हैं: चित्रकूट में भरत से संवाद रामकथा का सबसे कोमल राजनीतिक क्षण है, जहाँ दो भाई सिंहासन "तुम लो" की विनती में हार रहे हैं। जिस युग में उत्तराधिकार का अर्थ रक्तपात था, इस परिवार ने त्याग की प्रतिस्पर्धा रचकर दिखाई।
सीता — कथा की दूसरी धुरी
रामकथा जितनी राम की है, उतनी ही सीता की — और परंपरा ने इसे "सीताराम" युग्म-नाम में सदा स्वीकारा है। भूमिजा सीता का चरित्र हर मोड़ पर अपना निर्णय स्वयं लेता है — वन-गमन उनका चुनाव था, विलासी सुरक्षा का त्याग; अशोक-वाटिका में रावण के वैभव-प्रलोभन और भय — दोनों के सामने अडिग मर्यादा; और हनुमान द्वारा लंका से लौटा ले चलने के प्रस्ताव पर उनका उत्तर — मर्यादा की रक्षा राम के पराक्रम से हो, गुप्त पलायन से नहीं — उनके क्षत्राणी-गौरव का शिखर है। उत्तर-अध्यायों की परंपराओं में भी उनकी गरिमा ही अंतिम स्वर है — धरती की बेटी अंततः धरती की गोद में लौटती है, याचना नहीं करती। भक्ति-परंपरा में सीता करुणा की माता हैं — तुलसी की विनय-पत्रिका से लेकर लोक-गीतों तक, राम तक पहुँचने का द्वार माँ सीता की अनुशंसा मानी गई है।