भारतीय हृदय में श्रीकृष्ण का स्थान अनोखा है — वे एक साथ यशोदा के माखनचोर कन्हैया हैं, वृंदावन के वंशीधर हैं, द्वारका के नीति-निपुण अधिपति हैं, कुरुक्षेत्र के सारथी हैं और गीता के उपदेशक जगद्गुरु भी। परंपरा उन्हें "स्वयं भगवान" कहती है — अवतारों की माला में वह पूर्ण अवतरण, जिसके जीवन में बाल-लीला से लेकर ब्रह्म-ज्ञान तक मनुष्य-जीवन का हर रंग समाया है। शायद इसीलिए कृष्ण-कथा हर आयु के पाठक की कथा है — बालक उसमें सखा पाता है, युवा मार्गदर्शक, गृहस्थ कर्तव्य-बोध और साधक परम तत्त्व।
इस शृंखला में श्रीकृष्ण का जीवन आठ अध्यायों में प्रस्तुत है — कारागार के जन्म से गोकुल के आँगन तक; वृंदावन की लीलाओं से मथुरा के रंगमंच तक; द्वारका के गृहस्थ-पर्व से महाभारत के धर्म-संकट तक; और गीता के उपदेश से उद्धव-गीता के वैराग्य-ज्ञान होते हुए प्रभास की अंतिम लीला तक। प्रत्येक अध्याय का स्वतंत्र, विस्तृत पृष्ठ है — मौलिक हिंदी में प्रवाहमयी कथा, मुख्य पात्र-घटनाएँ, शिक्षाएँ, प्रश्नोत्तर और स्रोत-सूचना सहित।
इस प्रस्तुति की प्रतिज्ञाएँ स्पष्ट हैं। मुख्य आधार श्रीमद्भागवत महापुराण (विशेषतः दशम-एकादश स्कंध) है; जहाँ हरिवंश, विष्णुपुराण या महाभारत की धारा भिन्न है, वहाँ भेद स्पष्ट अंकित है — संस्करणों को मिलाकर कोई नई कथा नहीं गढ़ी गई। कोई श्लोक-संख्या या अध्याय-संख्या उद्धृत नहीं की गई — स्रोत केवल ग्रंथ/स्कंध-स्तर पर कहे गए हैं। रासलीला जैसे प्रसंग उसी दृष्टि से कहे गए हैं जिस दृष्टि से भागवत और आचार्य-परंपरा ने कहा — विशुद्ध आध्यात्मिक रूपक के रूप में, सांसारिक प्रेम-कथा के रूप में बिल्कुल नहीं। युद्ध-प्रसंग गरिमामय भाषा में हैं, और अंतिम लीला संयत स्वर में — जैसा उस कथा की मर्यादा माँगती है।
कृष्ण-कथा पढ़ना वस्तुतः जीवन जीने की कला पढ़ना है — विपत्ति में मुस्कान (कारागार में जन्म, फिर भी उत्सव), शक्ति में विनम्रता (कंस-विजेता का गुरु-आश्रम में समिधा बीनना), वैभव में मैत्री (द्वारकाधीश का सुदामा के लिए नंगे पाँव दौड़ना), संकट में विवेक (सारथी-भाव) और विदा में पूर्णता। आठ अध्याय — आठ रंग हैं उस एक ही चित्र के, जिसे परंपरा पूर्ण पुरुषोत्तम कहती है।