कामधेनु-प्रसंग — सत्कार के बदले हरण
एक दिन सहस्रार्जुन ससैन्य जमदग्नि के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने अपनी दिव्य कामधेनु-वंश की गौ (सुरभि-परंपरा) के प्रताप से पूरी सेना का ऐसा सत्कार किया कि सम्राट चकित रह गया। पर चकित मन में लोभ जागा — जिस गौ ने सत्कार दिया, राजा ने उसी को बलपूर्वक छीन लिया (धाराओं में विवरण-भेद है — कहीं गौ, कहीं बछड़े सहित हरण)। आश्रम लौटे परशुराम को वृत्तांत मिला, तो वह हुआ जो उस युग में अकल्पनीय था — एक तपस्वी ने चक्रवर्ती को युद्ध में परास्त कर उसका अंत कर दिया और गौ लौटा लाए।
पिता की प्रतिक्रिया ध्यान देने योग्य है — जमदग्नि ने पुत्र को विजय पर बधाई नहीं दी; कहा: राजा का वध बड़ा भारी कर्म है, तीर्थ-सेवन से चित्त शुद्ध करो। तपस्वी-कुल की मर्यादा यही थी — आवश्यक हो तो शस्त्र, पर उसका उत्सव कभी नहीं।
पिता की हत्या — और संकल्प
प्रतिशोध की अग्नि सुलगती रही। अवसर पाकर सहस्रार्जुन के पुत्रों ने आश्रम पर धावा बोला और ध्यानस्थ, निःशस्त्र जमदग्नि का वध कर डाला — माता रेणुका के विलाप की स्मृति परंपरा में इक्कीस आघातों से जुड़ी है। तपोवन में ऋषि-रक्त — यह उस युग की मर्यादा का पूर्ण पतन था। पितृ-शोक और उस पतन के विरुद्ध परशुराम के भीतर जो संकल्प उठा, उसी से परंपरा के अनुसार उनके इक्कीस अभियान चले — जिनमें निरंकुश, अत्याचारी क्षत्रिय राजवंशों का मान-मर्दन हुआ; समन्तपंचक (कुरुक्षेत्र क्षेत्र) के कुंडों की कथा-परंपरा इसी से जुड़ी है।
यहाँ पूर्ण स्पष्टता आवश्यक है, और यह कथा के ही भीतर से आती है — यह संघर्ष किसी वर्ण या समुदाय के विरुद्ध नहीं था: परशुराम स्वयं ऋषि-पुत्र होकर क्षत्रिय-धर्म के श्रेष्ठ आचार्य बने (भीष्म-द्रोण-कर्ण उनके शिष्य); धर्मनिष्ठ राजवंश उनके कोप के पात्र नहीं बने, और परंपरा-धाराएँ कहती हैं कि जो नम्र हुए, वे बचे रहे। उनका "शत्रु" पद था ही नहीं — पद का दुरुपयोग था। इस कथा को किसी जाति-द्वेष का रंग देना उसकी आत्मा के विरुद्ध है।
पृथ्वी-दान — इस कथा की कसौटी
अभियानों के बाद वह क्षण आया जो परशुराम-चरित्र की अग्नि-परीक्षा था — विजित पृथ्वी का क्या हो? इतिहास का हर विजेता यहाँ सिंहासन चुनता है। परशुराम ने यज्ञ किया और समस्त विजित भूमि कश्यप ऋषि को दान कर दी — और स्वयं दक्षिण के महेंद्र पर्वत पर तप करने चले गए; परंपरा-धाराओं में यह भी आता है कि दान के बाद उन्होंने दान की गई भूमि पर रात्रि-वास तक छोड़ दिया। जो योद्धा जीती हुई पृथ्वी अपने पास न रखे — उसका युद्ध सत्ता के लिए नहीं था: यही एक तथ्य इस पूरे रक्तिम अध्याय की नैतिक कसौटी है, और यही परशुराम को "आवेश-योद्धा" से "अवतार" बनाता है।
मातृ-प्रसंग — आज्ञा की कठोर परीक्षा
परशुराम-चरित्र का सबसे मार्मिक और सबसे विमर्श-योग्य प्रसंग पहले का है — पुराण-परंपरा के अनुसार एक क्षण की मानसिक स्खलन पर क्रुद्ध जमदग्नि ने पुत्रों को माता रेणुका के वध की आज्ञा दी; बड़े भाई काँप गए, परशुराम ने पितृ-आज्ञा का पालन किया — और प्रसन्न पिता से वर माँगने का अवसर मिलते ही पहला वर माँगा: माता और भाइयों का जीवन, स्मृति-लोप सहित। परंपरा इस प्रसंग को आज्ञा-पालन और मातृ-प्रेम के असंभव संतुलन के रूप में पढ़ती है — परशुराम ने आज्ञा भी निभाई और उसी आज्ञा के भीतर से माता को लौटा भी लाए। यह अनुकरण की नहीं, विमर्श की कथा है — धर्म-संकटों में बुद्धि का मार्ग खोजने की।
राम से भेंट — क्रोध का विश्राम
रामायण-परंपरा का प्रसिद्ध दृश्य — सीता-स्वयंवर में शिव-धनुष टूटा, तो उसकी टंकार सुन परशुराम क्रुद्ध आए: शिव-प्रसाद के धनुष का भंजन! उन्होंने दाशरथि राम को विष्णु-धनुष चढ़ाने की चुनौती दी — और राम ने सहज ही चढ़ा दिया। उस क्षण परशुराम ने पहचान लिया कि सम्मुख कौन है — एक अवतार ने दूसरे अवतार का तेज पहचाना, और क्रोध की धारा ने मर्यादा की धारा को मार्ग दे दिया; परशुराम तप के लिए लौट गए। परंपरा इस भेंट में युग-संक्रमण पढ़ती है — शस्त्र-प्रधान प्रतिकार का युग मर्यादा-प्रधान आदर्श को दायित्व सौंप रहा है।
चिरंजीवी — और आगे की परंपराएँ
परंपरा परशुराम को सप्त चिरंजीवियों में गिनती है — मान्यता है कि वे आज भी महेंद्र-क्षेत्र में तपरत हैं। महाभारत-धारा में वे भीष्म से आम्बा-प्रसंग पर युद्ध करते हैं (जो अनिर्णीत रहा), द्रोण को शस्त्र-विद्या और कर्ण को विद्या-दान करते हैं — कर्ण-प्रसंग का शाप-अध्याय (परिचय छिपाने पर) महाभारत की प्रसिद्ध त्रासदी है। कल्कि-परंपरा में वे भावी अवतार के शस्त्र-गुरु भी कहे गए हैं। कोंकण-केरल की तटीय भूमि को "परशुराम-क्षेत्र" कहने की क्षेत्रीय कथा है — मान्यता के अनुसार उन्होंने समुद्र से भूमि माँगकर/परशु फेंककर तट-भूमि प्रकट की; यह श्रद्धा-परंपरा है, ऐतिहासिक-भूवैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं।