यज्ञशाला में बटुक
नर्मदा-तट की यज्ञशाला में जब छोटे कद का तेजस्वी बटुक पहुँचा, तो कथा कहती है कि उसके तेज से सभा उठ खड़ी हुई — स्वयं बलि ने अर्घ्य-पाद्य से पूजन किया और वह वाक्य कहा जो दानवीरों की परंपरा का मुकुट है: माँगिए — भूमि, गौ, धन, ग्राम — जो इच्छा हो। वामन मुस्कुराए और माँगा — केवल तीन पग भूमि, अपने चरणों से नापकर। बलि हँसे — इतने बड़े दाता से इतना छोटा दान? कुछ और माँगो। वामन का उत्तर परंपरा में संतोष-शास्त्र का सूत्र है — जो तीन पग से संतुष्ट नहीं, उसे द्वीप भी संतुष्ट नहीं कर सकते; विवेकी वही जो आवश्यकता भर ले।
शुक्राचार्य की चेतावनी — और बलि का निर्णय
गुरु शुक्राचार्य ने संकट भाँप लिया — उन्होंने बलि को एकांत में चेताया: यह बटुक साधारण नहीं, स्वयं विष्णु हैं; तीन पग में तुम्हारा सर्वस्व चला जाएगा; वचन मत दो। यह क्षण कथा का नैतिक शिखर है। बलि ने उत्तर दिया — यदि ये स्वयं विष्णु हैं और मेरे द्वार याचक बनकर आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या? और प्रह्लाद के पौत्र का वचन झूठा हो — यह तो मृत्यु से भी बुरा है। जो देकर मुकर जाए, वह पृथ्वी का भार है। परंपरा की धाराओं में वर्णन है कि क्रुद्ध गुरु ने शिष्य को श्री-भ्रष्ट होने का शाप तक दे दिया — फिर भी बलि डिगे नहीं। संकल्प-जल हाथ में लिया गया; दान संकल्पित हुआ।
(यहाँ रुककर देखिए — कथा ने "धर्म-संकट" कैसा रचा है: गुरु की आज्ञा एक ओर, वचन-निष्ठा दूसरी ओर। बलि ने वह चुना जो कठिनतर था — और परंपरा ने उन्हीं का पक्ष लिया। वचन धर्म की रीढ़ है।)
त्रिविक्रम — दो पग में ब्रह्मांड
संकल्प पूर्ण होते ही वह घटा जिसे भारतीय कल्पना का सबसे विराट दृश्य कहा जा सकता है — वामन बढ़ने लगे। बटुक से विराट, विराट से विश्वरूप: त्रिविक्रम। परंपरा वर्णन करती है कि पहले पग में पृथ्वी नप गई, दूसरे में स्वर्गादि ऊर्ध्व-लोक — और नापते चरण के अँगूठे से ब्रह्मांड-कपाल पर जो छिद्र हुआ, वहाँ से प्रवेश करती धारा ब्रह्मद्रव-गंगा की कथा-परंपरा से जुड़ी: इसीलिए गंगा को "विष्णुपदी" (विष्णु के चरण से निकली) कहने की परंपरा है। ब्रह्माजी द्वारा उस चरण के प्रक्षालन की कथा भी इसी प्रसंग की शोभा है।
अब सभा में प्रश्न गूँजा — तीसरा पग कहाँ? वचन तीन पगों का था; दो में सब समाप्त। यह क्षण बलि की अग्नि-परीक्षा था — और उनका उत्तर भक्ति-साहित्य का स्वर्ण-वाक्य: जो कुछ "मेरा" था, वह आपने ले लिया; पर "मैं" अभी शेष हूँ — तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखिए। बलि झुके, और भगवान का चरण उनके मस्तक पर उतरा। परंपरा कहती है कि उसी स्पर्श में बलि का शेष अभिमान भी उतर गया — दान पूर्ण हुआ: संपत्ति, अधिकार, और अंत में अहंता।
दंड नहीं — अनुग्रह
अब कथा वह मोड़ लेती है जो इसे "विजय-कथा" से "प्रेम-कथा" बना देता है। भगवान ने बलि को नष्ट नहीं किया — परंपरा के अनुसार उन्हें सुतल लोक का ऐश्वर्य-राज्य दिया (जिसे कथा स्वर्ग से भी बढ़कर कहती है), अगले मन्वन्तर में इंद्र-पद का वचन दिया, और सबसे विलक्षण — स्वयं उनके द्वार के रक्षक होने का अनुग्रह: भक्त-वत्सलता की पराकाष्ठा, कि विजेता पराजित का द्वारपाल बने। प्रह्लाद इस दृश्य के साक्षी बने — पितामह की आँखों के सामने पौत्र "हारकर" वह पा गया जो जीतकर कोई नहीं पाता।
यहाँ यह स्पष्ट रहे — बलि इस कथा के खलनायक नहीं हैं; वे इसके दूसरे नायक हैं। परंपरा ने उन्हें चिरंजीवियों में गिना है और "बलि जैसा दानी" लोक-उपमा बन गया। कथा का "विरोधी" कोई व्यक्ति नहीं — वह सूक्ष्म अभिमान है जो श्रेष्ठतम दाताओं में भी उग आता है: "मैं दाता हूँ।" भगवान ने वही माँगकर हराया — बल से नहीं, याचना से।
ओणम — महाबली की स्मृति
केरल की परंपरा इस कथा को एक कोमल मोड़ देती है — मान्यता है कि भगवान ने बलि (मलयालम-परंपरा में महाबली/मावेली) को वर दिया कि वे वर्ष में एक बार अपनी प्रिय प्रजा से मिलने आ सकेंगे। उसी आगमन का उत्सव है ओणम — फूलों की पूकलम्-सज्जा, ओणसद्या का भोज, नौका-दौड़ और वह लोक-स्मृति जो कहती है: महाबली के राज्य में सब समान थे, कोई दुखी न था। एक "असुर" राजा के लिए इतना प्रेम — भारतीय परंपरा की उदारता का इससे सुंदर प्रमाण क्या होगा? वामन जयंती (भाद्रपद शुक्ल द्वादशी की परंपरा) भी इसी कथा का पर्व-स्मरण है।