कथा 1 — अमृत-वितरण (श्रीमद्भागवत की धारा)
परंपरा वर्णन करती है कि झगड़ते असुरों के बीच एक अनुपम सुंदरी प्रकट हुईं — ऐसी कांति कि सभा स्तब्ध रह गई। असुरों ने आपसी कलह भूलकर उनसे मध्यस्थता की प्रार्थना की — सुंदरी ने विनोदपूर्ण विनम्रता से चेताया भी कि मुझ पर इतना विश्वास उचित नहीं; पर मोह में डूबे असुरों ने आग्रह किया: वितरण आप ही करें। मोहिनी ने शर्त रखी — जो मैं करूँ, उसे सब स्वीकार करेंगे। सहमति हुई; देवता और असुर अलग-अलग पंक्तियों में बैठे।
वितरण देव-पंक्ति से आरंभ हुआ — और विवेक की धारा से चलता रहा। कथा के अनुसार मोहिनी की मधुर वाणी और गरिमा ने असुरों को प्रतीक्षा में बाँधे रखा — वे अपनी "पारी" की आशा में मुग्ध बैठे रहे, और अमृत देव-पंक्ति में बँटता गया। यह "पक्षपात" क्यों? परंपरा उत्तर देती है — अमृत शक्ति-वर्धक ही नहीं, प्रवृत्ति-वर्धक भी है: जो जैसा है, अमरता उसे वैसा ही स्थायी कर देती। अत्याचार को अमर करना किसी के हित में नहीं था — स्वयं असुरों के भी नहीं। वितरण का धर्म पात्रता देखना है — यही इस प्रसंग का कठोर, ईमानदार न्याय है।
राहु-केतु — पहचान और परिणाम
असुर-पक्ष का एक चतुर सदस्य — राहु (स्वरभानु की परंपरा) — वेश बदलकर देव-पंक्ति में, सूर्य और चंद्र के बीच जा बैठा। अमृत की बूँद उसके कंठ तक पहुँची ही थी कि सूर्य-चंद्र ने संकेत कर दिया। मोहिनी-रूप भगवान के सुदर्शन चक्र से उसका शीश विलग हुआ — किंतु अमृत-स्पर्श पा चुका शीश अमर रहा। परंपरा कहती है कि वही शीश राहु और धड़ केतु रूप में ज्योतिष-परंपरा के छाया-ग्रह बने — और सूर्य-चंद्र से उनके "वैर" की प्रतीक-कथा से ग्रहण की लोक-परंपरा जुड़ी: ग्रहण के समय राहु द्वारा सूर्य/चंद्र को "ग्रसने" की कथा। (यह धार्मिक-प्रतीक कथा है — ग्रहण की खगोलीय व्याख्या विज्ञान का विषय है; परंपरा और विज्ञान अपने-अपने क्षेत्र में हैं।)
इस उप-प्रसंग की शिक्षा भी स्पष्ट है — छल से पाया अमृत भी पूरा नहीं फलता; और पंक्ति बदलने से पात्रता नहीं बदल जाती।
क्या यह छल था? — परंपरा का उत्तर
यह प्रश्न परंपरा से बार-बार पूछा गया है, और परंपरा इससे भागती नहीं। उत्तर तीन स्तरों पर है। पहला — असुरों ने कलश बल से छीना था; वितरण-न्याय का दावा छीनने वाले का नहीं बनता। दूसरा — मोहिनी ने आरंभ में ही चेताया था कि मुझ पर विश्वास मत करो; मोह असुरों का अपना चुनाव था। तीसरा और गहनतम — यह प्रसंग "माया" के स्वभाव का दर्शन है: संसार में मोह व्याप्त है ही; प्रश्न यह है कि उसकी डोर किसके हाथ में है। भागवत की दृष्टि में वह डोर भी अंततः भगवान के हाथ में है — जो सौंदर्य में भी परमात्मा देखता है, वह अमृत पाता है; जो सौंदर्य पर रुक जाता है, वह पंक्ति में बैठा रह जाता है।
कथा 2 — भस्मासुर-प्रसंग (पृथक कथा, पृथक स्रोत-धारा)
मोहिनी से जुड़ी दूसरी प्रसिद्ध कथा भस्मासुर की है — और यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि यह अमृत-वितरण वाली घटना नहीं है: प्रसंग, काल और स्रोत-धारा दोनों के अलग-अलग हैं। यह कथा मुख्यतः पुराण-लोक परंपरा (शिव-कथा धाराओं व दक्षिण की स्थल-परंपराओं) में मिलती है, जबकि अमृत-वितरण भागवत की धारा है।
कथा के अनुसार एक असुर ने घोर तप से शिवजी को प्रसन्न कर वर पाया — जिसके सिर पर हाथ रखे, वह भस्म हो जाए। वर पाते ही उसकी बुद्धि फिरी — उसने परीक्षण के लिए वरदाता की ही ओर हाथ बढ़ाया; इसी से नाम पड़ा भस्मासुर। संकट-क्षण में मोहिनी प्रकट हुईं। असुर मुग्ध हुआ; मोहिनी ने विवाह की शर्त रखी — मेरे समान नृत्य करके दिखाओ। नृत्य चला — मुद्रा-दर-मुद्रा असुर अनुकरण करता गया; और एक मुद्रा में मोहिनी का हाथ अपने ही मस्तक पर गया। मोह में डूबे असुर ने बिना सोचे वही किया — और अपने ही वरदान से भस्म हो गया।
इस कथा का मर्म भी वही है, पर कोण नया है — अविवेकी शक्ति स्वयं अपना संहार है। भस्मासुर को किसी ने नहीं मारा; उसे उसकी मोहांध जल्दबाज़ी ने मारा। और मोहिनी की विधि देखिए — न शस्त्र, न शाप: केवल नृत्य, और वह धैर्य जो मोह को उसके ही तर्क से उसके अंत तक ले जाता है।
दक्षिण की परंपरा — अय्यप्पा और कला-धारा
दक्षिण भारत की परंपरा में मोहिनी-रूप से एक और महत्वपूर्ण धारा जुड़ी है — मान्यता के अनुसार शिव-मोहिनी संयोग से शास्ता (अय्यप्पा) की परंपरा जुड़ती है, जिनका प्रसिद्ध धाम शबरीमला (केरल) है; हरि-हर के पुत्र रूप में "हरिहरपुत्र" नाम इसी भाव का है। (इस कथा के विवरण भी परंपरा-भेद रखते हैं — हम इसे मान्यता-रूप में ही प्रस्तुत करते हैं।) और केरल की शास्त्रीय नृत्य-शैली "मोहिनीअट्टम्" — मोहिनी का नृत्य — इस अवतार की स्मृति को कला में जीवित रखती है: कोमल लास्य, श्वेत-स्वर्ण वेश, और वही गरिमा जो इस रूप का प्राण है।
यह रेखांकित करना आवश्यक है — परंपरा ने मोहिनी-रूप को कभी हल्के या सनसनीखेज रंग में नहीं देखा। यह माया का गरिमामय, प्रयोजन-सिद्ध रूप है; और स्त्री-रूप में अवतरण यह भी घोषित करता है कि दिव्यता किसी एक रूप में बँधी नहीं — रूप साधन है, प्रयोजन धर्म-रक्षा।