संकट — धँसता हुआ पर्वत
मंथन आरंभ ही हुआ था कि पहली विपत्ति आ गई — मन्दराचल का कोई आधार नहीं था; विराट पर्वत क्षीरसागर में धँसने लगा। दोनों पक्षों का बल, वासुकि की नेती, सारी योजना — सब डूबने को हुई। उत्साह से शुरू हुए महाउद्यम प्रायः यहीं मरते हैं — आधार की कमी से।
तभी परंपरा कहती है कि भगवान ने विराट कूर्म का रूप धारण किया — योजन-विस्तीर्ण पीठ वाला दिव्य कच्छप — और जल में उतरकर डूबते पर्वत के नीचे स्थित हो गए। मन्दराचल उस पीठ पर टिक गया। अब पर्वत घूमता रहा, पीठ अडिग रही — भागवत-परंपरा में तो यह मधुर भाव भी है कि पीठ पर घूमता पर्वत भगवान को खुजली-सुख जैसा लगा। संकट को भी लीला बना देना — यही भगवत्-शैली है। परंपरा यह भी कहती है कि भगवान ने ऊपर से पर्वत को थामा और देव-असुर पंक्तियों में शक्ति-संचार भी किया — अर्थात आधार भी वही, ऊर्जा भी वही; श्रेय की पंक्ति में फिर भी नाम मथने वालों का।
मंथन — पहले विष, फिर रत्न
मंथन चला — और सबसे पहले निकला हलाहल विष: इतना प्रचंड कि तीनों लोक व्याकुल हो उठे। यह क्षण कथा का सबसे गहरा पाठ है — मंथन चाहे सागर का हो या जीवन का, पहला उत्पाद प्रायः विष होता है: कड़वे सत्य, पुराने घाव, छिपी कटुताएँ। इस विष का समाधान बना हरि-हर सहयोग का अमर दृश्य — लोक-रक्षा के लिए भगवान शिव ने हलाहल को कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए; माता पार्वती की सजगता से विष कंठ से नीचे नहीं उतरा। न उगला, न निगला — जगत की कटुता को कंठ में रोक लेना: यह क्षमता ही शिवत्व है।
फिर क्रमशः चौदह रत्न प्रकट हुए — परंपरा की सूची में: कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रम्भा आदि अप्सराएँ, स्वयं लक्ष्मीजी — जिन्होंने सबके देखते भगवान विष्णु का वरण किया — वारुणी, चंद्रमा, पारिजात, पाञ्चजन्य शंख की धाराएँ (ग्रंथ-भेद सहित), और अंत में हाथ में अमृत-कलश लिए धन्वंतरि। अमृत के प्रकट होते ही छीना-झपटी और मोहिनी-प्रसंग की कथा चली — वह अगले अवतारों (धन्वंतरि व मोहिनी) के पृष्ठों पर विस्तार से है।
धुरी की ओर देखिए
पर ठहरकर पूछिए — इस पूरे महाआयोजन की धुरी कौन थी? मथने वाले नहीं — वे तो थककर बदलते रहे; रस्सी भी नहीं। धुरी थी वह पीठ, जो नीचे अंधेरे जल में चुपचाप सब कुछ सँभाले रही। किसी ने उसे मंच पर नहीं देखा; रत्न बँटे तो श्रेय ऊपर वालों को मिला। कूर्म-अवतार का यही मर्म है — हर महान उपलब्धि के नीचे कोई मौन आधार होता है: घर की कोई माँ, संस्था का कोई अनाम कार्यकर्ता, समाज का कोई नींव-पुरुष। नींव दिखती नहीं, पर भवन उसी पर खड़ा है।
कूर्म-स्वभाव — गति नहीं, टिकाव
कूर्म की महिमा उसके स्वभाव में भी है। वह गति में धीमा है, पर टिकाव में अद्वितीय; उसकी पीठ कठोर है, पर भीतर जीवन कोमल; और संकट में वह अंग समेटना जानता है। गीता ने साधक के लिए यही दृष्टांत चुना — इंद्रियों को विषयों से वैसे ही समेट लेना जैसे कूर्म अंग। जल्दबाज़ी के युग में कूर्म धैर्य का शास्त्र है — मंथन लंबा चलता है, विष पहले निकलता है, अमृत अंत में; जो बीच में रस्सी छोड़ दे, उसके हिस्से केवल हलाहल आता है।
रत्नों का प्रतीक-पाठ
मंथन के रत्न भी केवल "पुरस्कार-सूची" नहीं — व्याख्या-परंपरा उनमें साधना-फलों के प्रतीक पढ़ती आई है। कामधेनु — तृप्त चित्त, जो हर आवश्यकता स्वयं पूर देता है; उच्चैःश्रवा — साधना से उठी उज्ज्वल प्राण-ऊर्जा; कल्पवृक्ष — संकल्प-शक्ति की सिद्धि; कौस्तुभ — हृदय-गुहा का निर्मल आत्म-रत्न; लक्ष्मी — वह श्री जो स्वयं शुद्ध हुए चित्त का वरण करती है (उन्हें खोजा नहीं जाता, वे आती हैं); चंद्रमा — शीतल मन; धन्वंतरि-अमृत — अंतिम फल: अमरता-बोध। और वारुणी (मद) जैसे रत्न चेतावनी हैं — मंथन-मार्ग में उन्मत्त करने वाली उपलब्धियाँ भी आती हैं, जिन्हें असुर-वृत्ति को सौंपकर आगे बढ़ना पड़ता है। यह प्रतीक-पाठ परंपरागत व्याख्या-दृष्टि है — कथा का एकमात्र अर्थ नहीं; पर वह इस आख्यान को हर साधक की निजी डायरी बना देता है: तुम्हारे मंथन में अभी कौन-सा रत्न निकला है — और रस्सी छूटी तो नहीं?