प्राकट्य — कलशधारी देव
भागवत-परंपरा वर्णन करती है कि मंथन के अंतिम चरण में क्षीरसागर से एक अद्भुत पुरुष प्रकट हुए — श्याम-सुंदर वर्ण, पीत वस्त्र, आजानुबाहु, वक्ष पर श्रीवत्स-आभा, और हाथों में स्वर्ण-कलश जिसमें अमृत भरा था। देवताओं ने पहचाना — यह स्वयं भगवान का अंश-अवतरण है; परंपरा ने इन्हें धन्वंतरि नाम से प्रतिष्ठित किया और देव-वैद्य का पद दिया।
प्राकट्य के साथ ही कथा नाटकीय मोड़ लेती है — अमृत-कलश देखते ही असुरों ने उसे छीन लिया; उनमें परस्पर कलह छिड़ गया। धन्वंतरि उस छीना-झपटी में नहीं उलझे — उनका कार्य कलश लाना था; वितरण का विवेक मोहिनी-रूप को सौंपा गया (वह कथा अगले पृष्ठ पर)। यह विभाजन सूक्ष्म संकेत है: चिकित्सक का धर्म देना है; अधिकार-विवाद उसका क्षेत्र नहीं।
आयुर्वेद-परंपरा के आदि-प्रवर्तक
भारतीय परंपरा ने धन्वंतरि को आयुर्वेद — "आयु का वेद" — की गुरु-परंपरा का आदि-स्रोत माना। आयुर्वेद-ग्रंथ अपने ज्ञान की वंश-रेखा प्रायः ब्रह्मा → दक्ष/इंद्र-परंपरा → धन्वंतरि/भारद्वाज-धाराओं से जोड़ते हैं। सुश्रुत-संहिता की परंपरा में शल्य-विद्या (शल्य-चिकित्सा) की धारा काशिराज दिवोदास धन्वंतरि से वर्णित है — सुश्रुत जिनके शिष्य कहे गए हैं।
यहाँ एक भेद स्पष्ट रखना ईमानदारी है — मंथन से प्रकट देव-धन्वंतरि और काशी के राजवंश में वर्णित दिवोदास धन्वंतरि की धाराएँ ग्रंथों में अलग-अलग मिलती हैं; पुराण-परंपरा में यह भी वर्णन है कि देव-धन्वंतरि ने ही आगे काशी-वंश में जन्म लेकर आयुर्वेद को लोक में प्रचारित किया। दोनों को जोड़ने वाली यह कड़ी परंपरागत मान्यता है — हम दोनों धाराओं को उनके नाम-भेद सहित रखते हैं, एक जीवनी में नहीं मिलाते।
धनतेरस — आरोग्य का पर्व
धन्वंतरि-परंपरा भारतीय जीवन में जितनी गहराई से रची-बसी है, उतनी शायद ही किसी अल्प-कथा वाले अवतार की हो। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी — धनतेरस — परंपरा में धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाई जाती है; इसी दिन से भारत सरकार की परंपरा में "राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस" भी जुड़ा है। दीपावली से दो दिन पूर्व का यह पर्व एक सुंदर क्रम रचता है — लक्ष्मी-पूजन से पहले आरोग्य-पूजन: पहला धन स्वास्थ्य है।
वैद्य-परंपरा में आज भी अनेक चिकित्सक और वैद्यशालाएँ कार्य आरंभ से पूर्व धन्वंतरि का मंगल-स्मरण करते हैं; आयुर्वेद-संस्थानों में उनकी मूर्ति-प्रतिष्ठा की परिपाटी है। ध्यान-परंपरा में उन्हें "सर्व-रोग-निवारक, अमृत-कलश-धारी" कहा गया है — यह श्रद्धा और मंगल-कामना की भाषा है; इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उपासना चिकित्सा का विकल्प है। परंपरा स्वयं विवेक सिखाती है — आयुर्वेद "आयु का वेद (ज्ञान)" है, कामना-पूर्ति का जादू नहीं; और रोग की स्थिति में योग्य चिकित्सक से परामर्श ही उचित है।
शरीरमाद्यं — देह की गरिमा
धन्वंतरि-अवतरण का गहरा संदेश देह-दृष्टि में है। भारतीय परंपरा में एक प्रसिद्ध सूक्ति है — "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्": शरीर ही धर्म का प्रथम साधन है। जो देह रोग से टूटी हो, उससे न तप सधता है, न सेवा, न स्वाध्याय। इसीलिए परंपरा ने आरोग्य-विद्या को "उपवेद" की गरिमा दी और उसके प्रवर्तक को अवतार की। आहार-विहार का संयम, ऋतु के अनुसार दिनचर्या, निद्रा-जागरण का विवेक — आयुर्वेद-परंपरा की ये मूल दृष्टियाँ किसी रोग का नुस्खा नहीं, जीवन-शैली का शास्त्र हैं; इनका सामान्य पालन भी स्वास्थ्य-संस्कृति है। और समाज के स्तर पर यह अवतार चिकित्सक को दिव्य गरिमा देता है — रोगी की करुण सेवा को परंपरा नारायण-सेवा के तुल्य आदर देती है।
वैद्य-धर्म — धन्वंतरि-परंपरा की आचार-दृष्टि
धन्वंतरि-परंपरा ने केवल विद्या नहीं, वैद्य का आचार-शास्त्र भी गढ़ा। आयुर्वेद-संहिताओं की परंपरा वैद्य के चार गुण गिनाती है — शास्त्र-ज्ञान, अनुभव, दक्षता और शुचिता; और उसकी वृत्ति के चार भाव — रोगी के प्रति मैत्री और करुणा, साध्य रोग में प्रयत्न-हर्ष, और असाध्य में भी उपेक्षा नहीं — अंत तक साथ। दीक्षा-परंपराओं में वैद्य से यह व्रत लिया जाता रहा कि वह रोगी के घर की बात बाहर न कहे, दीन-दुर्बल की चिकित्सा से मुँह न मोड़े — सेवा-गोपनीयता-निष्पक्षता की यह त्रयी आधुनिक चिकित्सा-नीतिशास्त्र से सदियों पहले भारतीय वैद्यशालाओं में गूँज रही थी। गुरु-शिष्य परंपरा (धन्वंतरि-दिवोदास-सुश्रुत की धारा, और भारद्वाज-आत्रेय-चरक की समांतर धारा) ने इस विद्या को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा — शल्य से काय-चिकित्सा तक आठ अंगों वाले "अष्टांग आयुर्वेद" की परंपरा इसी की देन है। धन्वंतरि का सच्चा प्रसाद यही आचार-दृष्टि है — औषधि हाथ में हो और करुणा हृदय में, तभी वैद्य पूरा होता है।