प्रह्लाद — अत्याचार के घर में भक्ति
पाँच वर्ष का प्रह्लाद गुरुकुल भेजा गया — शिक्षक असुर-नीति पढ़ाते, बालक सहपाठियों को नारायण-भक्ति सिखाता। पिता ने पूछा — पुत्र, सबसे अच्छा क्या सीखा? उत्तर मिला — भगवान का श्रवण, कीर्तन, स्मरण... नवधा भक्ति के नौ अंग, जिनकी यह गणना परंपरा में प्रह्लाद के ही नाम से अमर है। पिता का क्रोध बढ़ता गया — समझाइश, प्रलोभन, भय; फिर कथा के अनुसार क्रूर दंड: पर्वत से गिराना, विषधरों के बीच छोड़ना, विष देना, अस्त्रों से प्रहार — और हर बार बालक सुरक्षित; हर बार उत्तर वही शांत वाक्य: नारायण।
इसी शृंखला की लोक-प्रसिद्ध कड़ी है होलिका-प्रसंग — हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से सुरक्षा का वर प्राप्त था, प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठी; परिणाम उल्टा हुआ — बालक बचा, होलिका जली। (स्रोत-सावधानी: यह प्रसंग मुख्यतः पुराण-लोक परंपरा में विस्तार पाता है; भागवत की मुख्य धारा में वध-प्रयासों की सूची मिलती है, होलिका-नाम की प्रमुखता लोक-परंपरा की देन है।) इसी स्मृति से होलिका-दहन की पर्व-परंपरा जुड़ी है — बुराई जलती है, भक्ति बचती है।
वह प्रश्न — और खंभे का उत्तर
अंतिम दृश्य सभा-भवन का है। हारे हुए उपायों से जला हिरण्यकशिपु ने पुत्र से वह प्रश्न पूछा जो इस कथा की धुरी है — यदि तेरा नारायण सर्वत्र है, तो क्या इस खंभे में भी है? बालक ने निर्भय उत्तर दिया — हाँ, इसमें भी। क्रोधोन्मत्त असुर ने खंभे पर प्रहार किया —
— और परंपरा कहती है कि खंभा फटा, और उसमें से वह रूप प्रकट हुआ जिसे देखकर काल भी ठिठक जाए: नरसिंह — आधा नर, आधा सिंह; न पूर्ण मनुष्य, न पूर्ण पशु। सभा स्तब्ध; असुर-योद्धा जो आगे बढ़े, बिखर गए। यह प्राकट्य-क्षण भक्ति-साहित्य का सबसे रोमांचक क्षण माना जाता है — भगवान गर्भ से नहीं जन्मे, प्रतीक्षा से नहीं आए; भक्त के वचन की लाज रखने प्रकट हुए: प्रह्लाद ने कह दिया था "इसमें भी है" — तो खंभे से ही आना था।
वरदान की शर्तें — और उनका अक्षरशः पालन
अब देखिए विधान की सूक्ष्मता — वध हुआ संध्या-वेला में (न दिन, न रात); देहरी पर (न भीतर, न बाहर); नरसिंह ने असुर को अपनी जंघा पर रखा (न भूमि, न आकाश); रूप था नर-सिंह (न मनुष्य, न पशु); और साधन बने नख (न अस्त्र, न शस्त्र)। ब्रह्मा का वरदान झूठा नहीं हुआ — एक-एक शर्त का अक्षरशः पालन करते हुए अधर्म का अंत हो गया। (यहाँ किसी रक्त-वर्णन की आवश्यकता नहीं — कथा का बल विभीषिका पर नहीं, विधान की अचूकता पर है।)
यही इस कथा की गहनतम शिक्षा है — अहंकार शर्तें जोड़ता है, विधान संधियाँ खोज लेता है। मनुष्य सोचता है कि उसने सब द्वार बंद कर लिए; भूल जाता है कि द्वारों के बीच की देहरी भी एक स्थान है, दिन-रात के बीच संध्या भी एक काल।
प्रह्लाद की प्रार्थना — उग्रता से वात्सल्य तक
वध के बाद का दृश्य परंपरा में उतना ही महत्वपूर्ण है। नरसिंह का प्रचंड रूप शांत नहीं हो रहा था — देवता निकट जाने का साहस न कर सके; परंपरा की धाराओं में लक्ष्मीजी तक ठिठक गईं। तब वही पाँच वर्ष का बालक निर्भय आगे बढ़ा — प्रह्लाद ने प्रणाम किया, स्तुति की; और सिंह-गर्जना वात्सल्य में पिघल गई। भागवत-परंपरा में प्रह्लाद की यह स्तुति भक्ति-दर्शन का रत्न मानी जाती है — जिसमें बालक कहता है कि मुझे वर नहीं चाहिए; वर माँगना तो व्यापार है, भक्ति नहीं। अंततः माँगा भी तो यह — मेरे हृदय में कामनाएँ न उगें, और मेरे पिता का उद्धार हो।
जो रूप त्रिलोक से शांत न हुआ, वह निश्छल श्रद्धा से शांत हो गया — परंपरा इसी में नरसिंह-तत्त्व का पूरा रहस्य पढ़ती है: उग्रता अधर्म के लिए है, भक्त के लिए वही रूप वात्सल्य है। इसीलिए उपासना-परंपरा में दोनों स्वरूप पूजित हैं — उग्र-नरसिंह (संहार-भाव) और लक्ष्मी-नरसिंह (शांत, लक्ष्मी-सहित अनुग्रह-भाव); भक्तों में लक्ष्मी-नरसिंह की उपासना विशेष प्रिय है — शक्ति जब करुणा के साथ बैठती है, तभी पूर्ण होती है।
प्रह्लाद राजा हुए — असुर-कुल में भक्त-राजा; और जय-विजय की वापसी-यात्रा का दूसरा चरण पूरा हुआ। आगे इसी वंश में बलि आए — वामन-कथा के महादानी; अत्याचारी के घर से भक्तों की परंपरा चली, यह भी इसी कथा की देन है।