अंजलि की मछली — करुणा की परीक्षा
कृतमाला नदी के तट पर राजा सत्यव्रत तर्पण कर रहे थे। अंजलि में जल भरा, तो उसमें एक नन्ही मछली आ गई। राजा उसे लौटाने लगे — कथा कहती है कि मछली ने मनुष्य-वाणी में प्रार्थना की: राजन्, जल में बड़े जीव मुझे खा जाएँगे; मेरी रक्षा करो। दयालु राजा उसे कमंडलु में ले आए।
पर अगली ही सुबह मछली कमंडलु से बड़ी हो चुकी थी। घड़े में रखी — घड़ा छोटा; सरोवर में — सरोवर छोटा; बड़ी झीलों और नदी में भी वही क्रम। अंत में राजा उसे सागर ले गए, तो मछली बोली — सागर में मगर मुझे खा जाएँगे! अब सत्यव्रत समझ गए कि यह कोई साधारण जीव नहीं। उन्होंने हाथ जोड़े — आप कौन हैं? और उत्तर मिला: यह स्वयं नारायण का मत्स्य-रूप है, जो एक महाप्रयोजन से प्रकट हुआ है। ध्यान दीजिए — भगवान ने अपनी पहचान तभी खोली जब राजा की करुणा हर पात्र की परीक्षा पार कर चुकी थी; कृपा प्रायः याचक के वेश में आकर हमारी करुणा नापती है।
प्रलय-सूचना — सात दिन की तैयारी
मत्स्य भगवान ने सत्यव्रत को आने वाले संकट की सूचना दी — आज से सातवें दिन प्रलय का जल तीनों लोकों को आप्लावित कर देगा। किंतु यह सूचना निराशा के लिए नहीं, तैयारी के लिए थी। निर्देश स्पष्ट थे — एक विशाल नौका तुम्हारे पास पहुँचेगी; उसमें सप्तर्षियों को, सब प्रकार की औषधियों और बीजों को, और जीवन के आवश्यक तत्वों को लेकर चढ़ जाना; महाजल में जब नौका डोलने लगे, तो मेरे शृंग (सींग) से उसे वासुकि नाग की रस्सी से बाँध देना।
सात दिन — पुराणों की यह संख्या भी बोलती है: विपत्ति से पहले चेतावनी और तैयारी का अवसर प्रायः मिलता है; बुद्धिमान वही है जो उस अवधि को व्याकुलता में नहीं, व्यवस्था में लगाए। सत्यव्रत ने वही किया — भगवन्नाम-स्मरण करते हुए प्रतीक्षा और तैयारी।
महाजल — नौका और शृंग
सातवें दिन दिशाएँ टूट पड़ीं — मेघों की झड़ी, उमड़ते समुद्र, डूबती धरती। नौका प्रकट हुई; सत्यव्रत ने ऋषियों, बीजों और सहचरों सहित आरोहण किया। महाजल में जब नौका पत्ते-सी डोलने लगी, तब जल चीरता हुआ वह विराट मत्स्य प्रकट हुआ — एक शृंगधारी, स्वर्ण-आभ, पर्वताकार। वासुकि की रस्सी से नौका शृंग से बँधी — और फिर उस प्रलय-रात्रि में भी नौका डोली नहीं, क्योंकि खींचने वाला स्वयं धैर्य का सागर था।
यात्रा-भर मत्स्य भगवान सत्यव्रत और ऋषियों को ज्ञान का उपदेश देते रहे — आत्मा-परमात्मा, सृष्टि-प्रलय, भक्ति और धर्म का वह संवाद, जिसकी परंपरा से मत्स्य पुराण का नाम जुड़ा है। प्रलय शांत हुआ; नौका ने नई सृष्टि के तट का स्पर्श किया — लोक-परंपरा इस तट-स्मृति को हिमालय-शिखरों से जोड़ती है। सत्यव्रत ही उस नई व्यवस्था के वैवस्वत मनु हुए — परंपरा के अनुसार हम सबकी वंश-कथा उसी नौका से उतरती है।
वेद-उद्धार — हयग्रीव असुर का अंत
भागवत-धारा इस कथा में दूसरा सूत्र जोड़ती है — वेदों का उद्धार। ब्रह्माजी की असावधानी के क्षण में हयग्रीव नामक असुर वेद-राशि का हरण कर सागर-गर्भ में छिपा था। मत्स्य भगवान ने प्रलय-प्रसंग के साथ उस असुर का भी अंत किया और वेद ब्रह्माजी को लौटाए। (यहाँ नाम-भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है — यह "हयग्रीव" असुर है; ज्ञान-दाता हयग्रीव अवतार — जो इसी सूची में आगे हैं — सर्वथा भिन्न; पुराणों में एक ही नाम कहीं असुर का, कहीं उद्धारक का मिलता है, और दोनों धाराएँ अपने-अपने प्रसंग में स्पष्ट हैं।)
अर्थात मत्स्य ने दो रक्षाएँ कीं — जीवन की भी, ज्ञान की भी; बीज भी बचाए और वेद भी। दशावतार-स्तुति की परंपरा में मत्स्य की वंदना प्रायः इसी वेद-रक्षक रूप में हुई है।
नौका-संवाद — प्रलय के बीच सत्संग
महाजल की उस यात्रा का सबसे विलक्षण पक्ष यह है कि परंपरा ने उसे भय-कथा नहीं, सत्संग-कथा बनाया। चारों ओर प्रलय गरज रहा है — और नौका के भीतर प्रश्नोत्तर चल रहे हैं: सत्यव्रत पूछते हैं, मत्स्य-रूप भगवान उत्तर देते हैं — जीव और ब्रह्म का संबंध, माया का स्वभाव, भक्ति की महिमा, सृष्टि-प्रलय का चक्र। भागवत कहता है कि इसी श्रवण-मनन से सत्यव्रत का ज्ञान परिपक्व हुआ और वे नई व्यवस्था के मनु होने योग्य बने। संदेश गहरा है — संकट-काल व्याकुल विलाप में भी बीत सकता है और ज्ञान-श्रवण में भी; जो प्रलय के बीच भी सीखता रहे, वही अगली सृष्टि का अधिकारी होता है। सत्यव्रत की परीक्षा भी ध्यान देने योग्य है — नन्ही मछली से विराट मीन तक हर चरण पर उनकी करुणा, धैर्य और श्रद्धा जाँची गई; मनु-पद योग्यता से मिला, अनुग्रह अकारण नहीं था — पात्रता और कृपा साथ चलीं।