प्राकट्य और राज्याभिषेक
वेन की देह के मंथन से प्रकट पृथु के लक्षण देखकर ऋषियों ने घोषणा की कि यह स्वयं भगवान का अंश है — चक्र-चिह्न आदि शुभ लक्षणों की परंपरा इस प्रसंग में वर्णित है। समाज ने राहत की साँस ली; पृथु का विधिवत राज्याभिषेक हुआ — परंपरा इसे पृथ्वी के "प्रथम अभिषिक्त सम्राट" के आदर्श-क्षण के रूप में स्मरण करती है। वंदीजनों ने स्तुति आरंभ की, तो पृथु ने विनम्रता से रोका — कथा के अनुसार उन्होंने कहा कि अभी मैंने कुछ किया ही नहीं; गुण होते हुए स्तुति सुनना भी अनुचित है, न होते हुए सुनना तो उपहास है। शासन की पहली घोषणा ही चरित्र की घोषणा थी।
अकाल — और धरती से संवाद
पृथु के सामने पहली चुनौती भूख थी। वेन के अराजक काल में पृथ्वी ने अपनी संपदा भीतर समेट ली थी — बीज उगते नहीं, अन्न मिलता नहीं; प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी। कथा का सबसे नाटकीय दृश्य यहीं है — क्रुद्ध पृथु ने धनुष उठाया; पृथ्वी गौ-रूप धारण कर भागी; पर हर दिशा में उसने पृथु को ही सम्मुख पाया। अंत में गौ-रूपा पृथ्वी ठहरी और बोली — राजन्, मुझ स्त्री-रूपा को मारने से क्या मिलेगा? और मुझे मारकर प्रजा को धारण कौन करेगा? मैंने संपदा इसलिए समेटी कि अपात्र उसे लूट रहे थे — व्यवस्था दो, तो मैं फिर सब दूँगी।
पृथु का क्रोध विवेक में बदला — और तब वह अद्भुत रूपक घटा जो इस कथा की आत्मा है: पृथ्वी का दोहन। पृथ्वी ने कहा — मुझे समतल करो, बछड़ा दो, दुहने वाला पात्र दो। पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर धरती से अन्न-औषधि दुहीं; फिर परंपरा वर्णन करती है कि ऋषियों ने अपने बछड़े-पात्र से वेद-वाणी दुही, देवताओं ने अमृत-ऊर्जा, पितरों-नागों-गंधर्वों — सबने अपनी-अपनी संपदा। अर्थ स्पष्ट है: धरती सबको देती है, पर हर लेने वाले को अपना "बछड़ा" — अर्थात पोषण और वापसी का भाव — साथ रखना पड़ता है।
कृषि, ग्राम और शासन-व्यवस्था
दोहन-प्रसंग के बाद पृथु ने पृथ्वी को समतल किया — पर्वतीय ऊबड़-खाबड़ को व्यवस्थित कर कृषि-योग्य भूमि निकाली; ग्राम, नगर, दुर्ग, गोकुल आदि बसाहटों की व्यवस्था रची। परंपरा कहती है कि पृथु से पहले बसाहटें अनियोजित थीं — नियोजित ग्राम-नगर व्यवस्था का श्रेय परंपरा उन्हीं को देती है। इसी पालक-भाव से धरती उनकी "पुत्री" कहलाई — पृथु की पुत्री, पृथ्वी।
भागवत में पृथु-चरित्र राजधर्म का मानक है — प्रजा को उन्होंने अपनी संतान की तरह पाला; दंड से पहले करुणा और वैभव से पहले न्याय रखा; और स्वयं को प्रजा का स्वामी नहीं, सेवक और पालक कहा। उनकी सभा में सनकादि कुमार पधारे और पृथु ने विनम्र जिज्ञासा से आत्म-ज्ञान का उपदेश पाया — शासक के लिए सत्संग की यह भूख भी मानक ही है।
अश्वमेध और इंद्र-प्रसंग
परंपरा के अनुसार पृथु ने निन्यानबे अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किए; सौवें यज्ञ में इंद्र ने विघ्न डाला — वेश बदलकर यज्ञ-अश्व का हरण किया। पृथु-पुत्र ने अश्व लौटाया; प्रसंग बढ़ा तो स्वयं भगवान ने प्रकट होकर पृथु को शांत किया — और पृथु ने वह किया जो उनके चरित्र का शिखर है: सौवें यज्ञ का आग्रह ही छोड़ दिया। यश की अंतिम सीढ़ी पर पहुँचकर सीढ़ी छोड़ देना — इससे बड़ा यश क्या? भागवत की धारा में भगवान ने पृथु को वर माँगने कहा, और पृथु ने माँगा — वस्तु नहीं, वह श्रवण-भक्ति जो कभी तृप्त न हो।
अंतिम अध्याय
वृद्धावस्था में पृथु ने राज्य योग्य उत्तराधिकारी को सौंपा और अर्चि सहित वानप्रस्थ लिया — तप करते हुए देह-विसर्जन किया। परंपरा कहती है कि अर्चि ने भी उनका अनुगमन किया। आदि-सम्राट का अंत भी आदर्श ही रहा — सत्ता से वैसी ही सहज विदाई, जैसी प्राप्ति के समय विनम्रता।
पृथु का शासन-दर्शन — प्रजा को दिया उद्बोधन
भागवत की धारा में पृथु का अपनी प्रजा को दिया गया उद्बोधन राजधर्म-साहित्य का रत्न माना जाता है। उन्होंने प्रजा से कहा — राजा प्रजा से जो कर लेता है, वह सेवा का पारिश्रमिक है; यदि राजा प्रजा को धर्म-मार्ग पर न चलाए, तो वह प्रजा के पाप का भागी होकर केवल उनका "कर-भक्षक" रह जाता है। इसीलिए उन्होंने प्रजा को स्वयं धर्म-निष्ठ रहने का आग्रह किया — शासक और प्रजा दोनों एक ही धर्म-रथ के दो पहिए हैं; एक भी टूटे तो रथ नहीं चलता।
परंपरा उनके शासन की व्यावहारिक व्यवस्थाएँ भी गिनाती है — दुर्बल की सुनवाई पहले, दंड से पहले जाँच, और कोष का उपयोग प्रजा-पालन में। अर्चि का सहधर्म भी स्मरणीय है — भागवत उन्हें पति के व्रतों की सहभागिनी कहता है: राजसुख में भी तपस्विनी-वृत्ति। पृथु-अर्चि का यह युगल गृहस्थ-धर्म और राजधर्म के संगम का आदर्श बना — सत्ता के शिखर पर बैठकर भी जो दंपति संयम से जिए, उसी का शासन प्रजा के लिए छाया बनता है।