प्राकट्य — मनु-वंश की गोद में
स्वायम्भुव मनु के घर की यह कथा है। उनकी पुत्री आकूति का विवाह प्रजापति रुचि से हुआ था — परंपरा के अनुसार इस विवाह में मनु ने यह भाव रखा था कि इस दंपति की संतान उनके ही घर की संतान मानी जाए (पुत्रिका-धर्म की प्राचीन परंपरा)। इसी घर में भगवान ने यज्ञ रूप में जन्म लिया, और उनके साथ दक्षिणा का प्राकट्य भी वर्णित है — जिन्हें परंपरा लक्ष्मी-अंश रूप में देखती है। आगे यज्ञ-दक्षिणा के विवाह और उनके पुत्रों (याम देवगण की परंपरा) का उल्लेख मिलता है।
यह पारिवारिक चित्र ही इस अवतार की पहली शिक्षा है — भगवान इस बार किसी वन, सागर या रणभूमि में नहीं, एक गृहस्थ व्यवस्था के भीतर उतरे; मानो कहना हो कि धर्म की नींव घर से, परिवार से, पीढ़ियों की मर्यादा से रखी जाती है।
स्वायम्भुव मन्वन्तर के इंद्र
परंपरा के अनुसार उस प्रथम मन्वन्तर में देवताओं की व्यवस्था अभी बन ही रही थी। भागवत की कथा-धारा कहती है कि यज्ञ ने याम नामक देवगणों के साथ उस मन्वन्तर में इंद्र-पद का दायित्व सँभाला — अर्थात लोक-पालन की सर्वोच्च जिम्मेदारी। एक प्रचलित प्रसंग यह भी है कि जब स्वायम्भुव मनु संयम-साधना में लीन थे और असुरों-राक्षसों का उपद्रव बढ़ा, तब यज्ञ ने देवगणों सहित उस संकट से लोक की रक्षा की।
यहाँ ईमानदारी से कहें — इन प्रसंगों के विवरण पुराणों में संक्षिप्त हैं; युद्धों के नाम-दर-नाम वर्णन नहीं मिलते। किंतु जो मिलता है, वह पर्याप्त बोलता है: प्रथम मन्वन्तर के "इंद्र" स्वयं भगवान का अवतरण थे — मानो व्यवस्था की पहली ईंट परमात्मा ने अपने हाथ से रखी हो।
यज्ञ-चक्र — इस अवतार का असली विग्रह
इस अवतार का नाम ही उसकी कुंजी है। वैदिक दृष्टि में यज्ञ पूरे ब्रह्मांड की कार्य-पद्धति है — गीता की प्रसिद्ध दृष्टि कहती है कि यज्ञ से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न, अन्न से प्राणी — और यह चक्र परस्पर अर्पण पर टिका है। देवता मनुष्य को पोषण दें, मनुष्य कृतज्ञता से अर्पण करे; जो इस चक्र से केवल लेता है और लौटाता कुछ नहीं, उसे गीता की परंपरा कठोर शब्द देती है — चोर।
भगवान का "यज्ञ" नाम से अवतरण इसी सत्य की घोषणा है — परमात्मा किसी एक व्यक्ति-रूप में ही नहीं, देने-बाँटने की पूरी व्यवस्था में विराजमान है। इसीलिए श्रीमद्भागवत में भगवान को बार-बार "यज्ञपुरुष", "यज्ञभोक्ता" कहा गया है — हर सच्चे अर्पण के अंतिम प्राप्तकर्ता वही हैं; और इसीलिए वराह-अवतार तक को परंपरा "यज्ञवराह" कहती है। चौबीस की सूची में "यज्ञ" की उपस्थिति यह स्मरण कराती है कि अवतार केवल संकट-मोचन नहीं — व्यवस्था-स्थापन भी है।
अल्प-चर्चित, पर अनिवार्य
यह पूछा जा सकता है — जब कथा इतनी संक्षिप्त है, तो परंपरा ने इसे चौबीस में क्यों गिना? उत्तर इस अवतार के स्वभाव में है। राम की कथा सुनाई जा सकती है, यज्ञ की कथा जी जानी होती है। जिस दिन कोई परिवार अपने भोजन में से किसी भूखे का हिस्सा निकालता है, जिस दिन कोई समर्थ व्यक्ति अपनी योग्यता समाज को लौटाता है — उस दिन यज्ञ-अवतार की कथा का एक अध्याय लिखा जाता है। यह अवतार ग्रंथों में छोटा और जीवन में विशाल है।
परंपरा की दृष्टि में हर मन्वन्तर की देव-व्यवस्था बदलती है, इंद्र बदलते हैं — पर यज्ञ-चक्र नहीं बदलता। उस चक्र का देवता बनकर भगवान ने प्रथम मन्वन्तर में जो आसन ग्रहण किया, वह आसन आज भी हर उस रसोई, खेत, विद्यालय और सेवा-स्थल में बिछा है, जहाँ देने का भाव जीवित है।