सूची आगे बढ़ी — अब जीव-जगत और मनुष्य-जगत के गुरु; इनमें कई तो ऐसे हैं जिनसे «सीखना» लोक की दृष्टि में अकल्पनीय था — और वहीं इस उपदेश की क्रांति है:
13. हाथी — स्पर्श-सुख की आसक्ति से हथिनी के लोभ में गड्ढे में जा गिरता है; कामासक्ति बल से नहीं, विवेक से जीती जाती है।
14. मधु निकालने वाला — मक्खियों का जोड़ा हुआ शहद एक क्षण में निकाल ले जाता है; कठिनाई से जोड़ा संग्रह अंततः दूसरों का होता है — संचय पर गर्व व्यर्थ है।
15. हिरण — संगीत-नाद पर मुग्ध होकर व्याध के जाल में फँसता है; इंद्रिय-रस की मोहिनी सावधान साधक को भी गिरा सकती है।
16. मछली — स्वाद के लोभ में काँटे का चारा निगल लेती है; रसना (स्वाद-लोलुपता) सब इंद्रियों में सबसे कठिन बंधन है — जो स्वाद जीत ले, वह सब जीत ले।
17. पिंगला — वह गणिका, जो रात भर धन-आशा में ग्राहक की बाट जोहती रही; अंततः थककर उसके भीतर वैराग्य जागा — आशा ही दुख है; जिस क्षण उसने आशा छोड़ी, उसी क्षण उसे चैन की नींद आई। अवधूत ने कहा — आशा-त्याग का यह पाठ मैंने उस स्त्री से सीखा, जिससे समाज मुँह फेरता था।
18. कुरर पक्षी — चोंच में माँस का टुकड़ा था, तो सारे बलवान पक्षी झपटते रहे; टुकड़ा छोड़ते ही वह निर्भय हो गया — «कुछ» के स्वामित्व में ही घिराव है, त्याग में शांति।
19. बालक — न मान की चिंता, न अपमान की गाँठ; अपने में मग्न — ज्ञानी की निश्चिंतता ऐसी ही होती है।
20. कुमारी के कंगन — घर में अतिथि आए तो धान कूटती कुमारी के कंगन खनक-खनककर भेद खोलने लगे; उसने एक-एक कर उतार दिए — अकेला कंगन नहीं खनकता। साधना भी भीड़ में नहीं सधती — विकल्पों का कोलाहल घटाओ, एकांत साधो।
21. बाण बनाने वाला — कारीगर बाण गढ़ने में ऐसा लीन था कि द्वार से राजा की सवारी निकल गई और उसे पता तक न चला; एकाग्रता वह है जिसमें संसार की सबसे बड़ी हलचल भी प्रवेश न पा सके।
22. सर्प — अपना बिल नहीं बनाता, दूसरों के बनाए में रह लेता है; अकेला विचरता है, टिकता नहीं — साधक अनिकेत रहे, ठिकाने की गाँठ न बाँधे।
23. मकड़ी — अपने भीतर से जाल रचती है, उसी में विहरती है और फिर उसे अपने में समेट लेती है — परमात्मा भी सृष्टि को अपने से रचता, धारता और अपने में लय कर लेता है; रचना और रचयिता भिन्न नहीं।
24. भृंगी कीट — कीड़े को पकड़कर अपने घर में बंद कर देता है और वह कीट भय-चिंतन करते-करते स्वयं भृंगी-भाव को प्राप्त हो जाता है (परंपरा का कीट-भृंग न्याय); जीव जिसका अखंड ध्यान करता है, वैसा ही हो जाता है — इसलिए ध्यान का विषय सोच-समझकर चुनो: यही इस पूरी सूची का शिखर-सूत्र है।
सूची पूरी कर अवधूत ने यदु से कहा — इन सबसे सीखकर मैंने वैराग्य और विवेक पाया; और अंत में यह भी जोड़ा कि अपनी देह से भी उन्होंने यही सीखा कि वह अंततः छूटने वाली है — अतः उससे काम लो, उसे «मैं» मत मानो। राजा यदु इस उपदेश से कृतार्थ हुए — और परंपरा के लिए यह संवाद सदा का दीपस्तंभ बन गया।