प्राकट्य और बदरिकाश्रम की तपोभूमि
धर्म और मूर्ति के घर जन्मे नर और नारायण ने जन्म से ही तप का मार्ग चुना। उन्होंने अपनी तपोभूमि चुनी — हिमालय की वह घाटी जो बेर (बदरी) के वृक्षों से घिरी थी: बदरिकाश्रम। परंपरा कहती है कि यह क्षेत्र इतना पवित्र माना गया कि आगे चलकर बद्रीनाथ धाम की मूर्ति-परंपरा और नाम-परंपरा इसी से जुड़ी — "बदरी के नाथ" नारायण।
दोनों ऋषि वहाँ सहस्रों वर्षों की कठोर साधना में लीन हुए — शीत, वर्षा, हिम — कुछ भी उनकी स्थिरता नहीं तोड़ पाया। भागवत-परंपरा में बदरिकाश्रम को भगवान का नित्य तपः-स्थल कहा गया है, जहाँ वे स्वयं साधक-रूप में विराजते हैं — यह भाव अपने-आप में अनूठा है: भगवान भक्तों को साधना सिखाने के लिए स्वयं साधक बन गए।
इंद्र की चिंता और कामदेव का अभियान
कथा का प्रसिद्ध मोड़ यहाँ आता है। तप जब प्रखर होता है, तो पुराणों में एक पात्र सदा बेचैन हो उठता है — इंद्र। देवराज को लगा कि यह युगल तप उनके सिंहासन के लिए चुनौती है। उन्होंने वही अस्त्र चुना जो हर तपस्वी पर आज़माया जाता था — कामदेव को, वसंत और अप्सराओं के दल समेत, बदरिकाश्रम भेजा गया।
हिम-घाटी में अचानक वसंत खिल उठा — कोकिल-स्वर, पुष्प-गंध, और अप्सराओं का नृत्य-संगीत। उद्देश्य स्पष्ट था: साधना की डोर तोड़ना। पर इस बार सामने कोई साधारण तपस्वी नहीं था। कथा कहती है कि नर-नारायण न क्रुद्ध हुए, न विचलित — उन्होंने आगंतुकों का अतिथि-सत्कार किया। क्रोध न होना ही पहला विस्मय था; जो तप क्रोध से टूट जाए, वह भी तो कच्चा ही है।
उर्वशी-प्राकट्य — सौंदर्य का उत्तर सौंदर्य से
फिर वह घटा जो इस कथा को अमर कर गया। परंपरा के अनुसार नारायण ने मुस्कुराकर अपनी जंघा (ऊरु) पर संकल्प किया — और वहाँ से एक ऐसी अनुपम सुंदरी प्रकट हुई कि इंद्र की भेजी अप्सराएँ लज्जित रह गईं। ऊरु से प्रकट होने के कारण वह उर्वशी कहलाई — अप्सराओं में श्रेष्ठ। नारायण ने उसे सम्मानपूर्वक देवलोक भेज दिया — मानो कह रहे हों: सौंदर्य से हमें डिगाने आए हो? सौंदर्य तो हमारे संकल्प का एक अंश-मात्र है।
यह प्रसंग भारतीय तप-परंपरा का शिखर-वाक्य है। जो तप कामना से लड़ता है, वह कभी भी हार सकता है; जो कामना से ऊपर उठ चुका है, उसे कौन डिगाए? विजय दमन में नहीं — अतिक्रमण में है। और विजय की भाषा भी देखिए — न शाप, न तिरस्कार; उत्तर में केवल रचना। श्रेष्ठ साधक चुनौती का उत्तर कटुता से नहीं, अपनी ऊँचाई से देता है।
सहस्रकवच-प्रसंग — तप और कर्म का सहयोग
पुराण-परंपरा में नर-नारायण से जुड़ा एक और प्रसंग मिलता है — सहस्रकवच नामक असुर का, जिसे वरदान था कि उसका एक कवच तभी टूटेगा जब कोई सहस्र वर्ष तप करे, और उससे युद्ध वही कर सकेगा जिसने वह तप किया हो। नर-नारायण ने इसका उत्तर अपने युगल-स्वरूप से दिया — एक तप करता, दूसरा युद्ध; फिर भूमिकाएँ बदल जातीं। इस प्रकार असुर के कवच क्रमशः टूटते गए। (इस प्रसंग के विवरण विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं — इसे पुराण-परंपरा की कथा के रूप में ही लेना उचित है।)
प्रतीक-दृष्टि से यह प्रसंग अद्भुत है — साधना और कर्म, ध्यान और युद्ध, एक-दूसरे के विरोधी नहीं, एक-दूसरे के कवच-भेदक सहयोगी हैं। अकेला कर्म थक जाता है; अकेला ध्यान अधूरा रह जाता है; दोनों की जुगलबंदी ही असंभव को संभव करती है।
अर्जुन-कृष्ण — धार्मिक परंपरा का सेतु
महाभारत-परंपरा इस युगल को एक और ऊँचाई देती है। धार्मिक मान्यता है कि द्वापर के अंत में यही नर और नारायण अर्जुन और श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुए — इसीलिए गीता-संवाद को परंपरा नर-नारायण संवाद की अगली कड़ी के रूप में देखती है: वही आश्रम, बस अब आश्रम का नाम कुरुक्षेत्र है; वही युगल, बस अब तप का नाम कर्तव्य है। महाभारत के अनेक पर्वों का पाठ इसी युगल की वंदना से आरंभ करने की परंपरा है। (यह संबंध धार्मिक-परंपरागत मान्यता है — हम इसे इसी रूप में प्रस्तुत करते हैं।)
बद्रीनाथ क्षेत्र में आज भी नर और नारायण नाम के दो पर्वत आमने-सामने खड़े हैं — मानो वह युगल तप भूगोल में अंकित हो गया हो। धाम की परंपरा कहती है कि जब तक ये पर्वत खड़े हैं, बदरी-क्षेत्र की साधना अखंड है।