प्राकट्य — नासिका से निकला नन्हा उद्धारक
ब्रह्माजी चिंतित थे — पृथ्वी जल में डूबी है, सृष्टि आगे कैसे बढ़े? परंपरा कहती है कि वे भगवान का स्मरण कर विचार कर ही रहे थे कि उनकी नासिका से अँगूठे भर का एक नन्हा वराह-शिशु प्रकट हुआ — और देखते-ही-देखते वह विशाल होता गया: पहले हाथी जितना, फिर पर्वत जितना, फिर ऐसा विराट कि दिशाएँ उसकी गर्जना से गूँज उठीं। ब्रह्माजी, मरीचि आदि ऋषि और मनु विस्मय से देखते रह गए — यह कौन है? परंपरा उत्तर देती है — यह स्वयं यज्ञपुरुष नारायण हैं, जो धरती को उठाने के लिए वराह-रूप में उतरे हैं।
सोचने योग्य बात है — भगवान चाहते तो किसी तेजोमय "सुंदर" रूप में प्रकट होते। पर जिस कार्य के लिए कीचड़ और जल की गहराई में उतरना हो, उसके लिए परंपरा ने वही रूप चुना जो इस कार्य में सहज कुशल है। रूप की शोभा कार्य की उपयुक्तता में है — वराह-प्राकट्य की पहली शिक्षा यही है।
जल में अवगाहन — पृथ्वी की खोज
विराट वराह ने गर्जना की — कथा कहती है कि उस ध्वनि में वैदिक स्तुतियों का सा गांभीर्य था, और जनलोक-तपोलोक के ऋषियों ने उसे मंगल-स्तवन की तरह सुना। फिर वराह भगवान ने जल में प्रवेश किया। पुराणकारों ने इस डुबकी का जीवंत वर्णन किया है — खुरों से चीरते हुए जल, घ्राण-शक्ति से पृथ्वी को खोजते हुए, जैसे कोई अपने खोए हुए प्रिय को ढूँढ रहा हो।
अंत में रसातल की गहराई में उन्हें पृथ्वी मिली — मलिन, निमग्न, निराधार। वराह भगवान ने उसे अपनी श्वेत दंष्ट्रा (दाँतों) पर धारण किया और ऊपर उठने लगे। परंपरा में यह चित्र अत्यंत पूज्य है — विराट श्याम वराह, और उसके चमकते दाँतों पर टिकी हरी-भरी धरती: मानो प्रलय-जल पर जीवन की पताका।
हिरण्याक्ष से संग्राम
किंतु मार्ग सरल नहीं था। जल के भीतर ही गदाधारी हिरण्याक्ष ने उन्हें ललकारा — वही असुर जिसके आतंक से देवलोक त्रस्त था, जो वरुण तक को युद्ध के लिए चुनौती दे चुका था और जिसे नारद से समाचार मिला था कि उसका "योग्य प्रतिद्वंद्वी" वराह-रूप में जल में उतरा है। असुर ने वचनों के तीखे बाण भी चलाए — पर वराह भगवान ने पहले पृथ्वी को जल के ऊपर सुरक्षित स्थापित किया, उसमें अपनी धारण-शक्ति स्थापित की, और तब युद्ध स्वीकारा। यह क्रम भी शिक्षा है — पहले दायित्व, फिर प्रतिशोध नहीं बल्कि प्रतिकार।
कथा के अनुसार दोनों का गदा-युद्ध भीषण था — बल, माया और दाँव-पेच का पूर्ण प्रदर्शन; स्वयं ब्रह्माजी ने भगवान को स्मरण कराया कि संध्या-वेला से पहले असुर का अंत कर दें। अंततः वराह भगवान के प्रहार से हिरण्याक्ष का अंत हुआ। भागवत-परंपरा इस मृत्यु में भी अनुग्रह देखती है — असुर का अंत स्वयं भगवान के स्पर्श से हुआ, और जय-विजय की वापसी-यात्रा का पहला चरण पूरा हुआ। (यहाँ किसी रक्तरंजित वर्णन की आवश्यकता नहीं — पुराणों का बल युद्ध की विभीषिका पर नहीं, अधर्म के अंत पर है।)
धरती की पुनर्स्थापना — आधार देने वाला अवतार
पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित करने का वर्णन सुंदर है — वराह भगवान ने उसे इस प्रकार टिकाया कि वह पुनः जीवन धारण कर सके। परंपरा कहती है कि उन्होंने पृथ्वी में धारण-शक्ति का आधान किया — पर्वत उसके कील हुए, समुद्र उसकी मेखला। इसीलिए वराह केवल "उठाने वाला" नहीं, "आधार देने वाला" अवतार कहलाता है — जो गिरे हुए को केवल उठाता नहीं, उसे फिर से खड़े रहने योग्य बनाता है।
परंपरा में पृथ्वी — भूदेवी — वराह भगवान की पत्नी-रूपा मानी गई हैं; दक्षिण भारत के मंदिरों में भूवराह स्वामी की मूर्तियों में भूदेवी उनके अंक में विराजती हैं। यह दांपत्य-प्रतीक गहरा है: धरती से मनुष्य का संबंध उपभोग का नहीं, वैसा आत्मीय होना चाहिए जैसा परिवार का।
यज्ञवराह — अर्पण-व्यवस्था का मूर्त रूप
भागवत-परंपरा वराह के विग्रह में यज्ञ की भावना करती है — उनके अंग-प्रत्यंग में यज्ञ-उपकरणों और वैदिक क्रियाओं का भाव देखा गया है, इसीलिए वे "यज्ञवराह" कहलाते हैं। संकेत स्पष्ट है — धरती को धारण करने वाली शक्ति वही है जो देने-बाँटने की व्यवस्था चलाती है। जहाँ अर्पण-चक्र टूटता है (हिरण्याक्ष का लोभ), वहाँ धरती डूबती है; जहाँ यज्ञ-भाव जीवित है, वहाँ धरती फिर थम जाती है।