वेद-विभाजन — इतिहास की सबसे बड़ी ज्ञान-परियोजना
तप और सामर्थ्य से परिपक्व होकर कृष्णद्वैपायन ने वह कार्य उठाया जिसने उन्हें व्यास बनाया — एक विराट, अखंड वेद-राशि का चार संहिताओं में विभाजन-संपादन: ऋग्, यजुः, साम, अथर्व। फिर चारों को चार समर्थ शिष्यों को सौंपा — पैल को ऋग्वेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद, जैमिनि को सामवेद, सुमन्तु को अथर्ववेद — जिनसे शाखा-प्रशाखाओं की अध्ययन-परंपरा चली।
इस कार्य का कद समझिए — बिना लिखित पुस्तकालयों के युग में ज्ञान को इस रीति से बाँटना कि वह स्मृति-परंपरा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अक्षत बहता रहे: यह मानव-इतिहास की सबसे सफल ज्ञान-संरक्षण परियोजनाओं में गिनने योग्य है। व्यास ने ज्ञान घटाया नहीं — उसे घाट दे दिए, जहाँ से हर सामर्थ्य का विद्यार्थी अपनी अंजलि भर सके।
पंचम वेद — महाभारत
फिर उन्होंने वह किया जो और भी दूरदर्शी था — जिनके लिए वेदाध्ययन के द्वार व्यवहारतः बंद थे, उन सबके लिए इतिहास-कथा की धारा रची: महाभारत — जिसे परंपरा "पंचम वेद" कहती है। लाख श्लोकों की परंपरा वाला यह महाकाव्य केवल युद्ध-कथा नहीं — धर्म, नीति, राजशास्त्र, मोक्ष-दर्शन का विश्वकोश है; इसी के भीतर श्रीमद्भगवद्गीता का संकलन-गौरव भी व्यास-परंपरा का है। महाभारत के विषय में परंपरा का प्रसिद्ध दावा है — जो यहाँ है, वह अन्यत्र मिल सकता है; जो यहाँ नहीं, वह कहीं नहीं।
रचना-कथा की सबसे प्रिय लोक-परंपरा गणेश-लेखन की है — व्यास बोलते गए, गणेशजी लिखते गए; शर्त यह कि लेखनी रुके नहीं, और प्रति-शर्त यह कि बिना समझे न लिखें — व्यास बीच-बीच में गूढ़ श्लोक रख देते, जिन्हें समझने में गणेशजी को क्षण लगता और व्यास आगे की रचना सोच लेते। (यह प्रसंग महाभारत की परवर्ती/लोक-परंपरा की देन माना जाता है — हम इसे परंपरा कहकर ही प्रस्तुत करते हैं।) इसी धारा में अठारह पुराणों की परंपरा और वेदांत के ब्रह्मसूत्र (बादरायण-सूत्र) का श्रेय भी व्यास-नाम से जुड़ा है।
महाभारत के भीतर व्यास — साक्षी और सहभागी
व्यास केवल महाभारत के रचयिता नहीं — उसके पात्र भी हैं, और यह दुर्लभ संयोग है। सत्यवती-पुत्र होने से वे कुरु-वंश के पितामह-स्थानीय हैं — वंश-संकट के क्षण में माता के स्मरण पर उपस्थित होकर नियोग-परंपरा (उस युग की धर्म-व्यवस्था) से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के जन्म का प्रसंग उन्हीं से जुड़ा है। वे बार-बार आते हैं — धृतराष्ट्र को समझाते, युधिष्ठिर को ढाढ़स देते, संजय को दिव्य-दृष्टि देते, गांधारी के शोक-शाप के साक्षी बनते। अपनी ही रचना के भीतर चलता हुआ रचनाकार — साक्षी भी, करुण सहभागी भी; पर कहीं भी घटनाओं पर बलात् नियंत्रण नहीं करता। यह स्वयं एक दर्शन है — ज्ञानी संसार को दिशा दे सकता है, किसी की स्वतंत्रता छीन नहीं सकता।
अधूरापन — और भागवत
इतना सब रचकर भी व्यास का मन शांत नहीं था — भागवत के आरंभ की यह कथा ज्ञान-परंपरा की सबसे मार्मिक स्वीकारोक्ति है। सरस्वती-तट पर उदास बैठे व्यास से नारद ने कारण पूछा और निदान दिया — आपने धर्म समझाया, ज्ञान गिनाया; पर भगवान के मधुर चरित्र-रस का अनन्य गान शेष है, और वही हृदय भरता है। तब व्यास ने समाधि में उतर कर श्रीमद्भागवत रचा — और उसे अपने पुत्र, परमहंस शुकदेव को पढ़ाया, जिनसे वह परीक्षित-संवाद के रूप में लोक में बहा। ज्ञान की पूर्णता भक्ति में है — यह निष्कर्ष किसी और का नहीं, स्वयं व्यास के जीवन का है।
व्यासपीठ — जीवित परंपरा
परंपरा व्यास को चिरंजीवी मानती है — बदरी-क्षेत्र (माणा की व्यास गुफा) से उनकी रचना-स्मृति जुड़ी है। आषाढ़ पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा / व्यास पूर्णिमा के रूप में उनका स्मरण-पर्व है — क्योंकि भारतीय गुरु-परंपरा उन्हें आदि-गुरु के आसन पर रखती है: आज भी हर कथा-वाचक जिस आसन से बोलता है, वह "व्यासपीठ" कहलाता है, और "व्यासोच्छिष्टं जगत् सर्वम्" की परंपरा-उक्ति कहती है कि ज्ञान का शायद ही कोई क्षेत्र हो जिसे व्यास ने छुआ न हो।
यहाँ एक ईमानदार टिप्पणी भी — व्यास को आधुनिक अर्थ में इन सभी ग्रंथों का अकेला "लेखक" कहना परंपरा और विद्वत्ता दोनों के साथ अन्याय होगा: परंपरा स्वयं "व्यास" को पद/दायित्व की संज्ञा भी मानती है, और विद्वानों का मत है कि महाभारत-पुराणों का वर्तमान रूप शताब्दियों की संकलन-यात्रा से बना। इससे व्यास छोटे नहीं होते — बड़े हो जाते हैं: वे एक व्यक्ति से अधिक एक परंपरा हैं, भारत की वह संपादक-चेतना जो हर युग में ज्ञान को सहेजती, जोड़ती और अगली पीढ़ी को सौंपती आई है।