गोकुल — दो भाइयों का बचपन
गोकुल-वृंदावन की लीलाएँ कृष्ण-कथा के नाम से प्रसिद्ध हैं, पर उनमें हर जगह एक गौर-वर्ण छाया साथ है — दाऊ। माखन-लीलाओं में सहभागी, गो-चारण में अग्रज, और संकट में ढाल। बल के प्रसंग बलराम के हिस्से ही आए — ताल-वन का धेनुकासुर (गर्दभ-रूप असुर) बलराम के हाथों समाप्त हुआ, और प्रलम्बासुर का प्रसंग तो उनकी पहचान-कथा है: खेल-खेल में असुर बलराम को कंधे पर उठाकर भागा, और बालक के मुष्टि-प्रहार ने उसका अंत कर दिया — कृष्ण की माया जहाँ मुस्कान से काम लेती है, बलराम का बल वहाँ सीधा उत्तर देता है। यही दोनों भाइयों का स्थायी स्वभाव-भेद है — कृष्ण वक्र (कलात्मक), बलराम ऋजु (सीधे); और दोनों मिलकर पूर्ण।
यमुना-आकर्षण की कथा बलराम के हल की सबसे प्रसिद्ध लीला है — विश्राम-क्रीड़ा के प्रसंग में यमुना को निकट बुलाने पर न आने से हलधर ने हल की नोक से धारा को ही खींचकर मार्ग बदल दिया (भागवत-हरिवंश की धाराओं में यह प्रसंग व्रज व द्वारका-काल दोनों से जुड़ा मिलता है)। प्रतीक की भाषा में यह किसान का चिर-कर्म है — जल को खेत की ओर मोड़ना; हलधर वही करते हैं जो कृषक युगों से करता आया है, बस दिव्य परिमाण में।
मथुरा — अखाड़े से गुरुकुल तक
अक्रूर के साथ दोनों भाई मथुरा पहुँचे — कंस के अखाड़े में चाणूर-मुष्टिक जैसे मल्लों के विरुद्ध किशोर भाइयों का द्वंद्व हुआ: कृष्ण ने चाणूर का, बलराम ने मुष्टिक का अंत किया; फिर कंस-वध (कृष्ण द्वारा) के साथ मथुरा मुक्त हुई। इसके बाद दोनों संदीपनि-आश्रम (उज्जयिनी) में विद्यार्थी बने — चौंसठ कलाओं का अध्ययन; अवतार भी गुरुकुल की मर्यादा से ही विद्या पाते हैं। आगे जरासंध के आक्रमणों के दीर्घ अध्याय में बलराम कृष्ण के युद्ध-सहचर रहे — और समुद्र-मध्य द्वारका के निर्माण-प्रसंग में नगर-व्यवस्था के सहभागी।
द्वारका-काल में बलराम का विवाह रैवत-कन्या रेवती से हुआ — रेवती-प्रसंग की पुराण-कथा (पूर्व-युग की कन्या, जिसकी लंबी देह बलराम ने हल से सामान्य की) युग-परिवर्तन की रोचक प्रतीक-कथा है। उनके व्यक्तित्व के मानवीय रंग भी परंपरा ने सहेजे — वारुणी-प्रसंग जैसी सहज-सरल छवियाँ, स्पष्ट क्रोध, तत्काल क्षमा; बलराम में देवत्व और लोक-स्वभाव का विरल घुलाव है।
गदा-गुरु — और महाभारत की तटस्थता
गदा-विद्या के परम आचार्य रूप में बलराम ने दो विलक्षण शिष्य बनाए — भीम और दुर्योधन; विद्या-दान में पक्ष नहीं देखा। पर यही दोनों शिष्य जब कुरुक्षेत्र में आमने-सामने हुए, तो गुरु के सामने असंभव चुनाव था। कृष्ण पांडव-पक्ष में सारथी बने; बलराम ने युद्ध से विरत रहकर तीर्थयात्रा का मार्ग चुना — सरस्वती-तट के तीर्थों की दीर्घ यात्रा, जिसका वर्णन भागवत-महाभारत की परंपरा में विस्तार से है। यह पलायन नहीं था — यह उस हृदय का निर्णय था जो दोनों पक्षों में अपने देखता था और किसी के विरुद्ध शस्त्र नहीं उठा सकता था। परंपरा इसमें संत-दृष्टि पढ़ती है: हर धर्म-संकट में तलवार ही उत्तर नहीं; कभी विरक्त तटस्थता भी एक धर्म है। युद्ध के अंतिम दिन लौटे बलराम भीम-दुर्योधन गदा-युद्ध के साक्षी बने — भीम के मर्म-प्रहार पर क्रुद्ध भी हुए (शिष्य-मोह और न्याय-प्रियता का द्वंद्व), पर कृष्ण के समझाने पर विधि-विधान स्वीकार किया।
तीर्थयात्रा-क्रम का एक कठोर प्रसंग भी ईमानदारी से — नैमिषारण्य में रोमहर्षण सूत (व्यास-शिष्य, पौराणिक) आसन से नहीं उठे, तो बलराम के आवेश में कुश-प्रहार से उनका देहांत हुआ; ऋषियों के क्षोभ पर बलराम ने प्रायश्चित्त किया और उनके पुत्र (उग्रश्रवा) को पिता का पद दिलाया। परंपरा इस प्रसंग को आवेश के परिणाम और प्रायश्चित्त-धर्म की शिक्षा के रूप में पढ़ती है — अवतार-चरित्र भी मर्यादा-भंग का मूल्य चुकाता दिखे, यही पुराणों की ईमानदारी है।
अंतिम अध्याय — शेष का विश्राम
यादव-वंश के अंत (मौसल-प्रसंग) के साक्षी बलराम भी बने — प्रभास-क्षेत्र में वंश-विनाश के बाद परंपरा कहती है कि बलराम सागर-तट पर योगस्थ हुए और उनके मुख से श्वेत शेष-तत्त्व निकलकर सागर की ओर चला गया — शेष अपने नित्य-धाम लौट गए। जो आधार बनकर आया था, वह कार्य पूर्ण कर मौन विदा हुआ — न युद्ध में, न शोक में; योग में।
बलभद्र — जगन्नाथ के बड़े भाई
बलराम की सबसे जीवंत उपस्थिति आज जगन्नाथ पुरी में है — रत्न-सिंहासन पर जगन्नाथ (कृष्ण) और सुभद्रा के साथ बलभद्र विराजते हैं, और रथ यात्रा में उनका तालध्वज रथ सबसे आगे चलता है: बड़ा भाई आगे — परंपरा ने यह मर्यादा वहाँ भी रखी है। ब्रज के बलदेव ग्राम का दाऊजी मंदिर ब्रज-परंपरा का प्रमुख बलराम-धाम है; किसान-परंपराएँ हलधर को कृषि-देव रूप में स्मरण करती हैं — हल षष्ठी (बलराम जयंती) व्रत-परंपरा इसी की स्मृति है।