धारा 1 — पुराणिक बुद्ध अवतार (वैष्णव दृष्टि)
श्रीमद्भागवत की अवतार-सूची कलियुग के संदर्भ में बुद्ध का स्मरण करती है — पुराण-उल्लेखों की परंपरा में उन्हें अंजन (अजिन)-पुत्र कहा गया और कीकट प्रदेश (गया-क्षेत्र, वर्तमान बिहार की परंपरागत पहचान) से जोड़ा गया। वैष्णव व्याख्या-परंपरा इस अवतरण का प्रयोजन यह बताती है — जब यज्ञ-विधियों की आड़ में हिंसा और कर्मकांड का आडंबर बढ़ गया, जब पशु-बलि जैसी प्रथाएँ धर्म के नाम पर रूढ़ हो चलीं, तब भगवान ने शांत, करुणामय रूप धारण कर अहिंसा और संयम का उपदेश दिया — बाहरी आडंबर से हटाकर भीतर की शुद्धि की ओर मोड़ा।
जयदेव कवि के गीतगोविंद की प्रसिद्ध दशावतार-स्तुति में बुद्ध की वंदना इसी भाव से है — श्रुति-विहित पशु-हिंसा का निषेध करने वाले सदय-हृदय (करुणा-हृदय) रूप में। भारत के अनेक मंदिरों की दशावतार-पट्टिकाओं में बुद्ध की मूर्ति सम्मान से अंकित है। कुछ पुराण-धाराओं में इस प्रसंग को "मोहन" (असुरों/अधर्म-पक्ष को मोहित कर हिंसक मार्ग से हटाने) की शैली में भी कहा गया है — विवरण ग्रंथ-भेद रखते हैं, और हम उन्हें एकरूप बनाने का दावा नहीं करते।
इस वैष्णव दृष्टि का ऐतिहासिक अर्थ भी पढ़ने योग्य है — यह उस युग की स्मृति है जब भारतीय समाज ने बुद्ध की करुणा और अहिंसा को इतना बड़ा माना कि अपनी ही अवतार-माला में उन्हें स्थान दे दिया: आत्मसात करने वाली ग्रहणशीलता। किंतु आधुनिक विद्वानों में यह विमर्श भी रहा है कि पुराण-वर्णित बुद्ध और ऐतिहासिक शाक्यमुनि का संबंध कैसे देखा जाए — कुछ परंपराएँ दोनों को एक मानती हैं; कुछ विद्वान पुराण-बुद्ध को पृथक (कथा-पात्र/भिन्न व्यक्तित्व) मानते हैं; तिथि-क्रम और विवरणों में भी मत-भेद हैं। हम कोई एक पक्ष "सिद्ध" घोषित नहीं करते — यही ईमानदारी है।
धारा 2 — ऐतिहासिक गौतम बुद्ध (बौद्ध परंपरा की दृष्टि)
इतिहास-परंपरा की दृष्टि से सिद्धार्थ गौतम का जन्म शाक्य गणराज्य में हुआ — पिता शुद्धोदन, माता मायादेवी; जन्म-स्थली लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल)। राजसी सुखों के बीच पले सिद्धार्थ को रोग, जरा, मृत्यु और श्रमण — इन दृश्यों ने भीतर से हिला दिया; गृह-त्याग (महाभिनिष्क्रमण) कर उन्होंने वर्षों कठोर तप किया, फिर अति-कठोरता भी छोड़कर मध्यम-मार्ग अपनाया — और बोधगया में बोधिवृक्ष तले बोधि (सम्यक् संबोधि) प्राप्त की: "बुद्ध" — जागे हुए।
सारनाथ में उन्होंने प्रथम उपदेश — धर्मचक्र-प्रवर्तन — दिया: चार आर्य सत्य (दुख है; दुख का कारण तृष्णा है; निरोध संभव है; मार्ग है) और आर्य अष्टांगिक मार्ग। लगभग पैंतालीस वर्षों तक वे गंगा-घाटी में विहार करते हुए उपदेश देते रहे — संघ बना, विश्व की प्राचीनतम जीवित भिक्षु-परंपराओं में एक। कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ। उनकी शिक्षा — शील, समाधि, प्रज्ञा; मैत्री-करुणा; और "अपना दीपक स्वयं बनो" का आत्म-पुरुषार्थ — भारत सहित एशिया के विशाल भूभाग के जीवन, कला और चिंतन को गहराई से रचती चली गई।
बौद्ध परंपरा की अपनी दृष्टि यहाँ स्पष्ट कहना अनिवार्य है — उसके अनुसार बुद्ध किसी देवता के अवतार नहीं हैं; वे मनुष्य-रूप में अपने पुरुषार्थ से जागे हुए सम्यक्-संबुद्ध हैं, और उनका धर्म-मार्ग एक स्वतंत्र, संपूर्ण परंपरा है। करोड़ों बौद्धों की यह आस्था अपने आप में पूर्ण और सम्माननीय है — उसे हिंदू अवतार-ढाँचे में विलीन कर देना न विद्वत्ता है, न शिष्टता। इसी प्रकार वैष्णव परंपरा की अवतार-दृष्टि उसकी अपनी श्रद्धा है — उसका उपहास भी उतना ही अनुचित है। दोनों परंपराएँ इस भूमि पर सदियों से साथ साँस लेती आई हैं — बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर और लुम्बिनी आज विश्व भर के बौद्धों के महातीर्थ हैं, और बुद्ध पूर्णिमा (वैशाख पूर्णिमा) दोनों परंपराओं में आदर का दिन — बौद्धों के लिए जन्म-बोधि-परिनिर्वाण की त्रि-स्मृति, अनेक हिंदू घरों में अवतार-स्मरण।
दोनों धाराओं का साझा हृदय
तो इस पृष्ठ का निष्कर्ष क्या हो? शायद यह — नाम-ढाँचों के भेद के नीचे दोनों परंपराएँ एक ही गुण के आगे झुकती हैं: करुणा। वैष्णव सूची ने करुणा को अवतार कहा; बौद्ध परंपरा ने करुणा को बुद्धत्व का हृदय कहा। भारत की ग्रहणशीलता का यह दुर्लभ दृश्य है — एक परंपरा ने भिन्न स्वर वाले महापुरुष को आराध्य माना; दूसरी ने अपनी स्वतंत्रता की गरिमा बनाए रखी; और दोनों के तीर्थ एक ही भूमि पर दीप जलाते हैं। बौद्ध धर्म के प्रति एक भी अनादर-शब्द के बिना, और वैष्णव श्रद्धा के प्रति पूर्ण आदर के साथ — यही इस कथा को कहने की एकमात्र उचित रीति है।