ग्रंथ-वर्णित चित्र — शम्भल, विष्णुयशा, देवदत्त
भागवत और विष्णु पुराण की धाराएँ भावी अवतरण का जो संक्षिप्त चित्र देती हैं, वह प्रतीकों से भरा है — शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयशा नामक श्रेष्ठ, सद्गुणी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि रूप में जन्म लेंगे। (माता के नाम पर ग्रंथ-भेद है — कल्कि पुराण की परंपरा में "सुमति" नाम मिलता है; भागवत-विष्णु पुराण की मुख्य धारा में पिता-नाम ही प्रमुख है। हम भेद को भेद ही रहने देते हैं।) वे श्वेत अश्व पर आरूढ़ होंगे — परंपरा में जिसका नाम देवदत्त मिलता है — और हाथ में खड्ग धारण करेंगे।
प्रतीकों को पढ़िए, क्योंकि यह कथा प्रतीकों में ही बोलती है। शम्भल — जिसकी परंपरागत भाव-व्याख्या शम् (कल्याण, शांति) से जुड़ती है: नव-धर्म का उदय किसी साम्राज्य की राजधानी से नहीं, कल्याण-भाव वाले छोटे-से ग्राम से होगा; बड़े परिवर्तन प्रायः हाशिये से उठते हैं। विष्णुयशा — "जिसका यश विष्णु हो": अवतार उस घर उतरेगा जहाँ कीर्ति की एकमात्र पूँजी भगवद्-निष्ठा है। श्वेत अश्व — गति और शुद्धि का संगम: परिवर्तन तीव्र भी होगा, निर्मल भी। और खड्ग — यहाँ सबसे अधिक सावधानी चाहिए: परंपरा की गहरी व्याख्या में यह खड्ग केवल युद्ध-शस्त्र नहीं, विवेक की धार है — ज्ञान-परंपरा में खड्ग सदा से अविद्या-ग्रंथि काटने का प्रतीक रहा है (गीता तक "ज्ञान-असि" की भाषा बोलती है); कल्कि का खड्ग अधर्म-विच्छेद का प्रतीक है — रक्तपात का उत्सव नहीं।
कार्य — म्लेच्छ नहीं, मल का नाश
पुराण-वाक्य कहते हैं कि कल्कि दुष्ट-दस्यु वृत्तियों का, छद्म-वेशधारी अधर्मी सत्ताओं का अंत करेंगे। यहाँ वह स्पष्टता अनिवार्य है जो इस कथा की रक्षा करती है — पुराणों का "अधर्मी" कोई जाति, समुदाय, देश या पंथ नहीं है: वह असत्य, अत्याचार, लोभ और छद्म की वृत्तियाँ हैं, जो हर युग में, हर समाज में — और सच पूछिए तो हर मन में — उगती हैं। कल्कि-कथा का उपयोग किसी मानव-समूह के विरुद्ध करना इस कथा की आत्मा की हत्या है; परंपरा ने यह कथा घृणा जगाने के लिए नहीं, आशा जगाने के लिए रची है।
परंपरा-धाराओं में यह सुंदर विवरण भी मिलता है कि चिरंजीवी परशुराम भावी कल्कि के शस्त्र-गुरु होंगे — शिव-आराधना और विद्या-ग्रहण की कथा कल्कि पुराण की धारा में है। (यह परवर्ती परंपरा-विवरण है — भागवत की मुख्य धारा का अंग नहीं; स्रोत-भेद सहित ही कहना उचित है।) एक अवतार दूसरे को दीक्षा दे — चिरंजीवी-परंपरा और अवतार-परंपरा का यह संगम भक्तों को प्रिय है: मानो परशुराम का रुका हुआ फरसा युगों से इसी शिष्य की प्रतीक्षा में हो।
पुनर्स्थापना — देवापि, मरु और नव-सत्ययुग
कल्कि-प्रसंग का समापन विनाश पर नहीं, पुनर्स्थापना पर होता है — यही इस कथा की असली दिशा है। परंपरा कहती है कि अधर्म-तंत्र के अंत के बाद सत्ययुग का चक्र पुनः चलेगा — मनुष्यों के चित्त निर्मल होंगे, धर्म चारों चरणों पर खड़ा होगा। भागवत-विष्णु पुराण की धाराओं में यह विलक्षण विवरण भी है कि देवापि (कुरु-वंश) और मरु (इक्ष्वाकु-वंश) नामक प्राचीन राजर्षि — जो परंपरा के अनुसार युगों से तप में प्रतीक्षारत हैं — नव-युग में धर्म-राज्य की व्यवस्था सँभालेंगे: पुरानी श्रेष्ठता नष्ट नहीं होती; वह प्रतीक्षा करती है, और नया युग उसे फिर बुला लेता है।
इस पृष्ठ की तीन अटल स्पष्टताएँ
इस पोर्टल की नीति के अनुरूप तीन बातें बिल्कुल साफ — पहली: कल्कि-अवतरण भविष्य की धार्मिक मान्यता है; इसकी कोई तिथि, वर्ष या "निकट भविष्य" की गणना शास्त्र-सम्मत रीति से संभव नहीं, और हम कोई गणना नहीं करते — पुराण स्वयं कलियुग को लक्ष-वर्षीय कहते हैं। दूसरी: इतिहास में समय-समय पर स्वयं को कल्कि घोषित करने वाले होते आए हैं — शास्त्रीय परंपरा किसी जीवित या ऐतिहासिक व्यक्ति के ऐसे दावे को मान्यता नहीं देती; ग्रंथ-वर्णित लक्षण किसी विज्ञापन से पूरे नहीं होते। तीसरी: इस कथा का कोई राजनीतिक या सामुदायिक उपयोग — किसी भी दिशा में — इसकी आत्मा के विरुद्ध है; कल्कि किसी दल, देश या समूह के "पक्ष" के नहीं, धर्म-वृत्ति के पक्षधर हैं, और धर्म-वृत्ति की पहली माँग स्वयं के मन का शोधन है।
तो प्रतीक्षा का अर्थ क्या हो? परंपरा का उत्तर कर्मठ है — हाथ पर हाथ धरे बैठना नहीं। गीता का वचन (धर्म-ग्लानि पर प्रकट होने का) यहाँ भविष्य के लिए दोहराया गया है, पर उसी गीता ने कर्तव्य को कभी स्थगित नहीं होने दिया। जो व्यक्ति आज असत्य के आगे झुकने से इनकार करता है, अपने हिस्से की करुणा और सच्चाई जीता है — वह उसी धर्म-पुनर्स्थापना का सैनिक है जिसका पूर्ण रूप परंपरा कल्कि में देखती है। श्वेत अश्व तभी दौड़ता आता है, जब धरती पर उसके स्वागत योग्य हृदय बचे हों।