धारा 1 — मधु-कैटभ से वेद-उद्धार (भागवत-परंपरा)
भागवत-धारा की कथा यों है — प्रलय-संधि पर ब्रह्माजी की निद्रा-वेला में उनके पास से वेद-राशि छूटी, और मधु-कैटभ नामक दो बलशाली असुरों ने उसका हरण कर लिया; वे रसातल/महाजल की गहराई में जा छिपे। वेदों के बिना ब्रह्माजी की सृष्टि-चेतना ही अंधी हो गई — व्याकुल ब्रह्मा ने भगवान की स्तुति की।
तब परंपरा कहती है कि भगवान ने हयग्रीव रूप धारण किया — श्वेत-कांति, अश्व-मुख, मानव-देह, चतुर्भुज; जिनके नि:श्वास में वेद-नाद था। उन्होंने गहराइयों में जाकर असुरों का अंत किया और वेद ब्रह्माजी को लौटा दिए — सृष्टि की आँखें फिर खुलीं। (मधु-कैटभ के वध की एक अन्य प्रसिद्ध पुराण-धारा — देवी-माहात्म्य परंपरा — इस प्रसंग को विष्णु के दीर्घ युद्ध और योगनिद्रा-देवी की भूमिका के साथ भिन्न रूप में कहती है; वहाँ हयग्रीव-रूप केंद्र में नहीं है। धाराओं का यह भेद भी नोट करने योग्य है — पुराण-साहित्य एक ही घटना-बीज को कई वृक्षों में उगाता है।)
धारा 2 — हयग्रीव नामक असुर वाली पृथक कथा
दूसरी धारा — जो मत्स्य-कथा से जुड़ती है — में वेद-हर्ता का नाम ही हयग्रीव है: वह असुर, जिससे मत्स्य-रूप भगवान ने वेद छुड़ाए। और देवीभागवत-परंपरा में एक और मार्मिक कथा मिलती है — धनुष-प्रसंग से भगवान विष्णु का शीश विलग होने पर देवताओं ने अश्व-शीश जोड़ा, और इसी हयग्रीव-रूप ने उस असुर का अंत किया जिसे "अपने ही सदृश" से मृत्यु का वर था।
यहाँ पाठक का चौंकना स्वाभाविक है — एक ही नाम कहीं उद्धारक का, कहीं असुर का? पर पुराण-साहित्य में यह नाम-साम्य सुविदित है और दोनों धाराएँ अपने-अपने प्रसंग में सुसंगत हैं — जैसे "राम" नाम परशुराम-बलराम-दाशरथि तीनों का है। मत्स्य-कथा से मिलते-जुलते प्रसंगों को अलग रखना ही शुद्ध पाठ है — वेद-उद्धार एक ही "घटना" नहीं, पुराणों का बार-बार दोहराया गया प्रिय कथा-बीज है: हर युग-संधि पर ज्ञान डूबता है, और कोई-न-कोई दिव्य रूप उसे लौटा लाता है। हम इन संस्करणों को मिलाकर कोई "संयुक्त कथा" नहीं बनाते — यही ईमानदारी है।
ज्ञान-स्मृति-विद्या के अधिष्ठाता
संस्करण जो भी हो, हयग्रीव की प्रतिष्ठा एक ही है — ज्ञानानन्दमय स्वरूप: दक्षिण-परंपरा का प्रसिद्ध ध्यान-श्लोक उन्हें "ज्ञान और आनंद जिनकी देह ही हो" कहकर वंदता है (हम श्लोक-पाठ यहाँ उद्धृत नहीं करते — भाव-अनुवाद ही देते हैं)। परंपरा में वे स्मृति, मेधा और वाणी के अधिष्ठाता हैं — मान्यता है कि सरस्वती-परंपरा तक की विद्या का स्रोत-प्रसाद इन्हीं से है, और विद्यारंभ के अवसर पर दक्षिण के अनेक परिवार आज भी हयग्रीव-स्मरण करते हैं। अक्षर-अभ्यास से शोध-ग्रंथ तक — विद्या की हर सीढ़ी पर यह अश्व-मुख आराध्य विद्यार्थियों का संरक्षक माना गया है।
श्रीवैष्णव परंपरा — देशिक से आज तक
हयग्रीव-उपासना की सबसे समृद्ध जीवित धारा दक्षिण की श्रीवैष्णव परंपरा में है। महान आचार्य वेदान्त देशिक (तेरहवीं-चौदहवीं शती की परंपरा) को हयग्रीव-अनुग्रह की कथा प्रसिद्ध है — तिरुवहीन्द्रपुरम् में साधना के फल रूप में उन्हें हयग्रीव-साक्षात्कार और वाणी-सिद्धि की मान्यता; उनका रचा "हयग्रीव स्तोत्र" आज भी विद्यार्थियों और विद्वानों की नित्य-पाठ परंपरा में है। तिरुवहीन्द्रपुरम् (तमिलनाडु) की हयग्रीव-पीठ, कांची-अहोबिल मठ-परंपराओं की हयग्रीव-आराधना, और मैसूर-परंपरा के लक्ष्मी-हयग्रीव विग्रह — दक्षिण में यह उपासना अखंड है। पूर्वोत्तर में हाजो (असम) का हयग्रीव-माधव मंदिर विलक्षण संगम-स्थली है — जहाँ हिंदू परंपरा हयग्रीव-माधव की पूजा करती है और बौद्ध परंपरा उसी क्षेत्र को अपनी श्रद्धा से देखती आई है (क्षेत्रीय मान्यताओं के भेद सहित) — एक ही स्थल पर दो परंपराओं की साझी श्रद्धा का सुंदर उदाहरण।
गणना की दृष्टि से — भागवत के प्रथम स्कंध की प्रसिद्ध सूची में हयग्रीव उस रूप में नहीं गिने गए; द्वितीय स्कंध आदि की धाराओं और पुराण-परंपरा से वे चौबीस की प्रचलित सूची में स्थान पाते हैं, और कुछ परंपराएँ उनके स्थान पर पृश्निगर्भ जैसे नाम गिनती हैं। यह भेद दोष नहीं — परंपरा की विविधता है; और इसी ईमानदार लेबल के साथ यह चौबीसवाँ मनका माला पूरी करता है।
विद्यार्थी-परंपरा — अक्षर से आचार्य तक
हयग्रीव-उपासना की जीवित धारा का सबसे कोमल दृश्य विद्यारंभ-संस्कार का है — दक्षिण के अनेक घरों-मंदिरों में बालक की पहली लिखाई (अक्षराभ्यास) हयग्रीव-स्मरण से आरंभ होती है: चावल की थाली पर नन्ही उँगली से पहला अक्षर, और साथ में उस अश्व-मुख आराध्य का नाम, जो परंपरा में समस्त विद्या का स्रोत है। यही धारा ऊपर तक जाती है — मठ-परंपराओं में ग्रंथ-पाठ के आरंभ में हयग्रीव-वंदना, और विद्वत्-सभाओं में वाक्-सिद्धि हेतु उनका स्मरण। वेदान्त देशिक की परंपरा-कथा इस धारा का शिखर है — कहा जाता है कि हयग्रीव-अनुग्रह से उनकी वाणी ऐसी अमोघ हुई कि वे "कवितार्किक-सिंह" (कवियों और तार्किकों में सिंह) कहलाए; उनकी शिष्य-परंपरा आज भी हयग्रीव स्तोत्र से दिन आरंभ करती है। एक स्पष्टता यहाँ भी — यह श्रद्धा-परंपरा अध्यवसाय की प्रेरक है, विकल्प नहीं: परंपरा स्वयं कहती है कि विद्या अभ्यास से आती है, और आराध्य का स्मरण उस अभ्यास को एकाग्रता व नम्रता की भूमि देता है। अक्षर से आचार्य तक की इस पूरी सीढ़ी पर हयग्रीव का हाथ पकड़ना — भारतीय विद्या-संस्कृति की जीवित रीति है।