ऋग्वेद
ऋग्वेदः
चारों वेदों में सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण, देवताओं की स्तुति
पढ़ने का समय
480 मिनट
श्लोक/आयत
10552
अध्याय/भाग
10
काल अनुमान
ईसा पूर्व 1500-1200
लेखक
ऋषियों द्वारा संग्रहीत
स्रोत
वैदिक परंपरा
ऋग्वेदः
चारों वेदों में सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण, देवताओं की स्तुति
पढ़ने का समय
480 मिनट
श्लोक/आयत
10552
अध्याय/भाग
10
काल अनुमान
ईसा पूर्व 1500-1200
लेखक
ऋषियों द्वारा संग्रहीत
स्रोत
वैदिक परंपरा
ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है और इसकी दस मंडलों में संकलित ऋचाएँ वैदिक साहित्य का मूल आधार हैं। ऋग्वेद की मुख्यतः शाकल शाखा आज उपलब्ध है, यद्यपि परंपरा में इसकी अन्य शाखाओं का भी उल्लेख मिलता है। यज्ञ की परंपरागत व्यवस्था में ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ 'होता' नामक पुरोहित करता है, जो देवताओं का आवाहन करता है। ऋग्वेद से जुड़े ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय और कौषीतकि हैं, और इन्हीं की परंपरा से ऐतरेय उपनिषद जुड़ा है, जिसमें प्रसिद्ध महावाक्य 'प्रज्ञानं ब्रह्म' मिलता है। ऋग्वेद की पहचान बनाने वाले सूक्तों में गायत्री मंत्र, नासदीय सूक्त (सृष्टि-चिंतन) और पुरुष सूक्त प्रमुख हैं। इस वेद की केंद्रीय शिक्षा को संक्षेप में यों कहा जा सकता है — 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं; यह भाव बुद्धि, कृतज्ञता और एकता की दृष्टि को दर्शाता है। वर्तमान समय में ऋग्वेद का महत्व गायत्री-साधना, एकता-मंत्र के रूप में और पर्यावरण-चेतना (नदियों-प्रकृति की स्तुतियों के माध्यम से) के रूप में देखा जाता है। इस पृष्ठ पर ऊपर ऋग्वेद का सरल-विस्तृत-मूल-विद्वत् चार दृष्टियों से परिचय दिया गया है; नीचे दिए संबंधित पृष्ठों पर ऋग्वेद की पूर्ण संरचना, शाखाएँ और मूल संहिता-पाठ का विस्तृत अध्ययन उपलब्ध है।
🕉️ ऋग्वेद की पूरी संरचना, शाखाएँ, ऋषि-परंपरा और मूल संहिता-पाठ के विस्तृत अध्ययन के लिए समर्पित खंड देखें।
विस्तार से पढ़ें →भाषा-शैली, छंद-रचना और सामग्री के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर विद्वान ऋग्वेद को शेष तीन वेदों से प्राचीन मानते हैं; यह शेष वेदों के लिए भी आधार-स्रोत रहा है।
नहीं, परंपरा में ऋग्वेद की अनेक शाखाओं का उल्लेख मिलता है, पर आज मुख्यतः शाकल शाखा का पाठ ही सुरक्षित और प्रचलित है।
गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में सूर्यदेव (सविता) की स्तुति के रूप में आता है और गायत्री छंद में रचित है।
ऐतरेय उपनिषद ऋग्वेद-परंपरा का ज्ञानकांड भाग है — यह वेद के भीतर ही कर्मकांड से ज्ञानकांड की ओर बढ़ने की यात्रा दिखाता है।