यजुर्वेद
यजुर्वेदः
यज्ञ की क्रियाओं, मंत्रों और उनके अर्थों का ग्रंथ
पढ़ने का समय
240 मिनट
श्लोक/आयत
1975
अध्याय/भाग
40
काल अनुमान
ईसा पूर्व 1200-1000
लेखक
याज्ञवल्क्य और अन्य ऋषि
स्रोत
वैदिक परंपरा
यजुर्वेदः
यज्ञ की क्रियाओं, मंत्रों और उनके अर्थों का ग्रंथ
पढ़ने का समय
240 मिनट
श्लोक/आयत
1975
अध्याय/भाग
40
काल अनुमान
ईसा पूर्व 1200-1000
लेखक
याज्ञवल्क्य और अन्य ऋषि
स्रोत
वैदिक परंपरा
यजुर्वेद यज्ञ-कर्म से सबसे सीधे जुड़ा वेद है — इसके मंत्र यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली क्रियाओं और आहुतियों के साथ पढ़े जाते हैं। इसकी दो प्रमुख शाखा-परंपराएँ हैं — शुक्ल यजुर्वेद (माध्यंदिन और काण्व शाखाएँ, जिसमें मंत्र और उनकी व्याख्या अलग-अलग रखी गई है) और कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ जैसी शाखाएँ, जिसमें मंत्र और व्याख्या मिश्रित रूप में हैं)। यज्ञ में यजुर्वेद के मंत्रों से क्रिया संपन्न करने वाला पुरोहित 'अध्वर्यु' कहलाता है। शुक्ल यजुर्वेद से शतपथ ब्राह्मण और कृष्ण यजुर्वेद से तैत्तिरीय ब्राह्मण जुड़े हैं। उपनिषद-परंपरा में शुक्ल यजुर्वेद से ईश और बृहदारण्यक उपनिषद जुड़े हैं (जिनमें क्रमशः 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' और 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य मिलते हैं), जबकि कृष्ण यजुर्वेद से तैत्तिरीय, कठ और श्वेताश्वतर उपनिषद जुड़े हैं। यजुर्वेद के प्रसिद्ध मंत्रों में ईशावास्य मंत्र, शतरुद्रिय (शिव-स्तुति), महामृत्युंजय मंत्र और शिवसंकल्प सूक्त प्रमुख हैं। इस वेद की केंद्रीय शिक्षा त्यागपूर्वक भोग की है — जीवन को ही एक यज्ञ के रूप में देखने की दृष्टि। वर्तमान समय में यजुर्वेद का महत्व विभिन्न संस्कार-विधियों, रुद्राभिषेक जैसी पूजा-पद्धतियों और त्याग-प्रधान जीवन-दर्शन के रूप में देखा जाता है।
🕉️ यजुर्वेद की पूरी संरचना, शाखाएँ, ऋषि-परंपरा और मूल संहिता-पाठ के विस्तृत अध्ययन के लिए समर्पित खंड देखें।
विस्तार से पढ़ें →शुक्ल यजुर्वेद में मंत्र और उनकी गद्य-व्याख्या अलग रखे गए हैं, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मंत्र और व्याख्या मिश्रित रूप में एक साथ आते हैं।
महामृत्युंजय मंत्र यजुर्वेद की परंपरा से जुड़ा एक प्रसिद्ध शिव-स्तुति मंत्र है, जिसका पाठ आज भी व्यापक रूप से किया जाता है।
अध्वर्यु यज्ञ में यजुर्वेद के मंत्रों के साथ वास्तविक क्रियाएँ (हवन-सामग्री अर्पित करना, वेदी बनाना आदि) संपन्न करने वाला पुरोहित है।
यह ईश उपनिषद का प्रारंभिक वाक्य है, जिसका भाव है कि यह संपूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है — त्यागपूर्वक भोग की शिक्षा इसी से जुड़ी है।