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मंत्र एवं स्तुतियाँ

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये

देवी दुर्गा · प्रार्थना

इतिहास–पुराण स्रोतदेवी दुर्गाप्रार्थना

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

📖 भावार्थ

हे समस्त मंगलों की मंगलमयी, कल्याणस्वरूप, सभी उचित पुरुषार्थों को पूर्ण करने वाली और शरण देने वाली माता नारायणी, आपको नमस्कार है।

📜 स्रोत

दुर्गासप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) परंपरा

🪔 पाठ-पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें

  • स्वच्छ स्थान और स्वच्छ शरीर — यथासंभव स्नान के पश्चात पाठ करें।
  • शांत मन — कुछ क्षण गहरी श्वास लेकर मन स्थिर करें।
  • श्रद्धा और सम्मान — शब्दों को धीरे, स्पष्ट और भावपूर्वक बोलें।
  • अर्थ समझकर पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है — भावार्थ अवश्य पढ़ें।

कौन पढ़ सकता है?

यह पाठ श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति कर सकता है — स्वच्छता, शांत मन और सम्मानपूर्ण उच्चारण ही मुख्य नियम हैं। विशेष साधना-विधियाँ (बीजमंत्र, दीक्षा, अनुष्ठान) योग्य गुरु-परंपरा से सीखें।

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🪔 महत्त्व व परिचय

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये दुर्गा सप्तशती से जुड़ा एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है, जो देवी को "सब मंगलों में भी मंगलमयी" के रूप में स्मरण करता है। यह श्लोक प्रायः विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर मंगल-आशीर्वाद के रूप में पढ़ा जाता है — इसकी लोकप्रियता इतनी अधिक है कि यह हिंदू विवाह-समारोहों में भी सुनाई देता है।

🕰️ कब और कैसे

इस परंपरा के अनुसार यह श्लोक विवाह, गृह-प्रवेश या अन्य शुभ अवसरों पर, तथा नवरात्रि में देवी-पूजा के समय पढ़ा जाता है। यह छोटा होने के कारण याद रखना सरल है।

🙏 आध्यात्मिक भाव

इसका भाव है समस्त शुभता का स्रोत देवी को मानना — किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में देवी-कृपा का स्मरण कर उसे मंगलमय बनाने की भावना।

प्रश्नोत्तर

यह श्लोक विवाह में क्यों पढ़ा जाता है?

परंपरा में देवी को सर्व-मंगलों की अधिष्ठात्री माना जाता है, इसलिए शुभ अवसरों पर उनका आशीर्वाद माँगा जाता है।

क्या यह श्लोक स्वतंत्र रूप से भी पढ़ा जा सकता है?

हाँ, यह किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में स्वतंत्र रूप से पढ़ा जा सकता है।

क्या यह केवल विवाह के लिए ही है?

नहीं, यह किसी भी शुभ अवसर या नियमित देवी-पूजा के लिए उपयुक्त है।

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