या देवी सर्वभूतेषु
देवी दुर्गा · प्रार्थना
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
📖 भावार्थ
जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम है।
📜 स्रोत
दुर्गासप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) परंपरा
🪔 पाठ-पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें
- ✦स्वच्छ स्थान और स्वच्छ शरीर — यथासंभव स्नान के पश्चात पाठ करें।
- ✦शांत मन — कुछ क्षण गहरी श्वास लेकर मन स्थिर करें।
- ✦श्रद्धा और सम्मान — शब्दों को धीरे, स्पष्ट और भावपूर्वक बोलें।
- ✦अर्थ समझकर पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है — भावार्थ अवश्य पढ़ें।
कौन पढ़ सकता है?
यह पाठ श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति कर सकता है — स्वच्छता, शांत मन और सम्मानपूर्ण उच्चारण ही मुख्य नियम हैं। विशेष साधना-विधियाँ (बीजमंत्र, दीक्षा, अनुष्ठान) योग्य गुरु-परंपरा से सीखें।
🔗 संबंधित मंत्र-स्तुतियाँ
🪔 महत्त्व व परिचय
या देवी सर्वभूतेषु दुर्गा सप्तशती से जुड़ा अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक-समूह है, जो देवी को सभी प्राणियों में विभिन्न रूपों — शक्ति, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, दया आदि — में व्याप्त बताता है। यह श्लोक इतिहास-पुराण स्रोत से जुड़ा माना जाता है और यह विचार व्यक्त करता है कि देवी किसी एक मंदिर या मूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव में किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं।
🕰️ कब और कैसे
इस परंपरा के अनुसार यह श्लोक-समूह नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती-पाठ के भीतर पढ़ा जाता है, तथा स्वतंत्र रूप से भी देवी-स्मरण हेतु किसी भी समय पढ़ा जा सकता है।
🙏 आध्यात्मिक भाव
इसका भाव है सर्वव्यापी दिव्यता का बोध — यह सिखाता है कि देवी-तत्व को केवल मंदिर में नहीं, बल्कि हर प्राणी में सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए।
❓ प्रश्नोत्तर
यह श्लोक-समूह किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह दुर्गा सप्तशती से जुड़ा इतिहास-पुराण स्रोत का प्रसिद्ध अंश माना जाता है।
क्या यह केवल नवरात्रि में पढ़ा जाता है?
नहीं, यह किसी भी समय देवी-स्मरण हेतु पढ़ा जा सकता है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश क्या है?
यह देवी को हर प्राणी में विभिन्न शुभ रूपों में व्याप्त बताता है — सम्मान और करुणा की सीख देता है।