सनातन ज्ञान
हिंदू धर्म · ज्ञान संसार
🔍 खोजेंनित्य कर्मचार वेदवेद18 महापुराण + 18 उपपुराणपुराणउपनिषद24 अवतारऋषि-मुनि ज्ञानकोशदेव-देवी ज्ञानकोशश्रीराम कथाश्रीकृष्ण कथाचार धामज्योतिर्लिंग52 शक्तिपीठशास्त्र पुस्तकालयग्रंथ संसारइतिहासमंत्रमंत्र एवं स्तुतियाँपाठ — सुंदरकांड आदिश्रवणपूजा विधिपर्व-त्योहार16 संस्कारपरंपराअखाड़े व सम्प्रदायपवित्र नदियाँपवित्र वृक्षगोत्र-प्रवरसमाधान (100 प्रश्नोत्तर)सनातन संवाद🔍 खोजेंनित्य कर्मचार वेदवेद18 महापुराण + 18 उपपुराणपुराणउपनिषद24 अवतारऋषि-मुनि ज्ञानकोशदेव-देवी ज्ञानकोशश्रीराम कथाश्रीकृष्ण कथाचार धामज्योतिर्लिंग52 शक्तिपीठशास्त्र पुस्तकालयग्रंथ संसारइतिहासमंत्रमंत्र एवं स्तुतियाँपाठ — सुंदरकांड आदिश्रवणपूजा विधिपर्व-त्योहार16 संस्कारपरंपराअखाड़े व सम्प्रदायपवित्र नदियाँपवित्र वृक्षगोत्र-प्रवरसमाधान (100 प्रश्नोत्तर)सनातन संवाद
मंत्र एवं स्तुतियाँ

अर्गला स्तोत्र

देवी दुर्गा · स्तोत्र

इतिहास–पुराण स्रोतदेवी दुर्गास्तोत्र

अर्गलास्तोत्रम् .. ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। .. श्री.. श्रीचण्डिकाध्यानम् ॐ बन्धूककुसुमाभासां पञ्चमुण्डाधिवासिनीम् . स्फुरच्चन्द्रकलारत्नमुकुटां मुण्डमालिनीम् .. त्रिनेत्रां रक्तवसनां पीनोन्नतघटस्तनीम् . पुस्तकं चाक्षमालां च वरं चाभयकं क्रमात् .. दधतीं संस्मरेन्नित्यमुत्तराम्नायमानिताम् . अथवा या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी या माहिषोन्मूलिनी या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी . शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिदात्री परा सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी .. अथ अर्गलास्तोत्रम् ॐ नमश्वण्डिकायै मार्कण्डेय उवाच . ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि . जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते .. १.. जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी . दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते .. २.. मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ३.. महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ४.. धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ५.. रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ६.. निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ७.. वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ८.. अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ९.. नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १०.. स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. ११.. चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १२.. देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १३.. विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १४.. विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १५.. सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १६.. विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १७.. देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १८.. प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. १९.. चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंसुते परमेश्वरि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २०.. कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २१.. हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २२.. इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २३.. देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २४.. भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २५.. तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे . रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि .. २६.. इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः . सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् .. २७.. .. इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ..

📖 भावार्थ

दुर्गासप्तशती-पाठ की परंपरा में पढ़ा जाने वाला अंग-स्तोत्र

📜 स्रोत

मूल पाठ स्रोत: संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org), CC BY-SA 4.0 — पाठ अपरिवर्तित लिया गया

🪔 पाठ-पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें

  • स्वच्छ स्थान और स्वच्छ शरीर — यथासंभव स्नान के पश्चात पाठ करें।
  • शांत मन — कुछ क्षण गहरी श्वास लेकर मन स्थिर करें।
  • श्रद्धा और सम्मान — शब्दों को धीरे, स्पष्ट और भावपूर्वक बोलें।
  • अर्थ समझकर पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है — भावार्थ अवश्य पढ़ें।

कौन पढ़ सकता है?

यह पाठ श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति कर सकता है — स्वच्छता, शांत मन और सम्मानपूर्ण उच्चारण ही मुख्य नियम हैं। विशेष साधना-विधियाँ (बीजमंत्र, दीक्षा, अनुष्ठान) योग्य गुरु-परंपरा से सीखें।

🔗 संबंधित मंत्र-स्तुतियाँ