छान्दोग्य उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद्
सबसे लंबा उपनिषद्, आत्मा का गहरा ज्ञान
पढ़ने का समय
120 मिनट
श्लोक/आयत
493
अध्याय/भाग
8
काल अनुमान
ईसा पूर्व 800-600
लेखक
ऋषि उद्दालक आरुणि
स्रोत
सामवेद
छान्दोग्य उपनिषद्
सबसे लंबा उपनिषद्, आत्मा का गहरा ज्ञान
पढ़ने का समय
120 मिनट
श्लोक/आयत
493
अध्याय/भाग
8
काल अनुमान
ईसा पूर्व 800-600
लेखक
ऋषि उद्दालक आरुणि
स्रोत
सामवेद
छान्दोग्य उपनिषद सामवेद से जुड़ा है और आकार में उपनिषदों में सबसे विशाल ग्रंथों में गिना जाता है। इसकी सबसे प्रसिद्ध देन है उद्दालक ऋषि और उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच का संवाद, जिसमें उद्दालक विभिन्न दृष्टांतों (जैसे नमक को जल में घोलना, वृक्ष के बीज को तोड़ना) के माध्यम से यह समझाते हैं कि सूक्ष्म सत्य समस्त सृष्टि में व्याप्त है, और हर दृष्टांत के अंत में प्रसिद्ध महावाक्य 'तत्त्वमसि' (तुम वही हो) दोहराया जाता है। इसके अतिरिक्त इस उपनिषद में सत्यकाम जाबाल की कथा भी है, जिसमें सत्य-भाषण के कारण एक निर्धन बालक को गुरु-आश्रम में प्रवेश और अंततः ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होता है — यह कथा जाति या कुल से अधिक सत्य और चरित्र के महत्व को दर्शाती है। नारद-सनत्कुमार संवाद में नारद अपने विशाल ज्ञान के बावजूद अतृप्ति व्यक्त करते हैं, जिससे सनत्कुमार उन्हें भूमा (असीम, परम तत्व) की ओर क्रमशः ले जाते हैं। छान्दोग्य उपनिषद ओंकार और सामगान की उपासना-पद्धति का भी विस्तृत विवेचन करता है, जो इसे सामवेद-परंपरा से स्वाभाविक रूप से जोड़ता है।
🪔 छान्दोग्य उपनिषद का विस्तृत अध्ययन-पृष्ठ — महावाक्य, कथाएँ और भाष्य-परंपरा सहित — देखें।
विस्तार से पढ़ें →इसका अर्थ है "तुम वही हो" — अर्थात जीवात्मा और परम ब्रह्म मूलतः अभिन्न हैं; यह उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद में बार-बार दोहराया गया है।
यह कथा दिखाती है कि सत्य-भाषण और चरित्र किसी व्यक्ति की योग्यता के लिए कुल-परिचय से अधिक महत्वपूर्ण हैं — सत्यकाम को अपने अनिश्चित कुल के बावजूद गुरु-आश्रम में प्रवेश मिला।
नारद-सनत्कुमार संवाद में भूमा उस असीम, परम तत्व को कहा गया है जिसमें कोई सीमा या द्वैत नहीं — यह सुख और पूर्णता का स्रोत बताया गया है।
यह सामवेद की छान्दोग्य/तांड्य शाखा से जुड़ा उपनिषद है।