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52 शक्तिपीठ

यशोरेश्वरी (यशोर)

52 शक्तिपीठ में क्रम 48 — ईश्वरीपुर, श्यामनगर, सातखीरा

यशोरेश्वरी (यशोर)

✦ यशोरेश्वरी ✦

📍 ईश्वरीपुर, श्यामनगर, सातखीरा

✨ एक झलक

मान्यता है कि यशोर क्षेत्र में सती के करतल (हथेलियाँ) गिरे; देवी यशोरेश्वरी रूप में और भैरव चंड रूप में पूजित। सातखीरा (बांग्लादेश) के ईश्वरीपुर की यह स्थली राजा प्रतापादित्य के संरक्षण की ऐतिहासिक स्मृति और सुंदरवन-अंचल की जीवित श्रद्धा का पीठ है।

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपयशोरेश्वरी
भैरवचंड
गिरा अंग/आभूषणकरतल (हथेलियाँ) — परंपरा अनुसार
आधुनिक स्थानईश्वरीपुर, श्यामनगर, सातखीरा
देशबांग्लादेश

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

🪔 दक्ष-यज्ञ से इस पीठ तक

सती-देह की अंग-वर्षा बंगाल के उस दक्षिणी अंचल तक पहुँची जहाँ आगे चलकर सुंदरवन के ज्वारीय वन फैले — यशोर भूमि। परंपरा कहती है कि यहाँ सती के करतल — हथेलियाँ — गिरे। हथेली देने और आशीर्वाद का अंग है: दान उसी से होता है, अभय-मुद्रा उसी से बनती है, और माँ का स्पर्श — सिर पर फिरता हाथ — जीवन का पहला आश्रय भी वही है। लोक-भाष्य कहता है कि यशोर की देवी "हाथ रखने वाली" माँ हैं — जिनका करतल भक्त के सिर पर छाया की तरह रहता है। देवी यहाँ यशोरेश्वरी कहलाती हैं — यशोर की ईश्वरी — और भैरव चंड रूप में।

पीठ की स्थली है सातखीरा जिले के श्यामनगर अंचल का ईश्वरीपुर गाँव — नाम ही जिसका "ईश्वरी का पुर" है। यहाँ यशोरेश्वरी काली का मंदिर इस पीठ की जीवित परंपरा है; गर्भगृह में देवी काली-रूप में पूजित हैं। मंदिर की स्थापत्य-स्मृति अनेक स्तंभों वाले प्राचीन ढाँचे की है — अनुश्रुति कहती है कि कभी यहाँ विशाल बहु-स्तंभी मंडप (शत-स्तंभ परंपरा की गिनती वाला) था, जिसके अवशेष-चिह्न काल के थपेड़ों के बाद भी स्थान की प्राचीनता कहते हैं। सुंदरवन की निकटता इस पीठ को विशेष रंग देती है — यह उस अंचल की देवी हैं जहाँ मनुष्य नदी, वन और व्याघ्र के बीच जीवन जीता है; जहाँ हर यात्रा से पहले माँ का नाम लिया जाता है।

🛕 देवी, भैरव और स्थान

इस पीठ का इतिहास-अध्याय बंगाल के "बारह भुइयाँ" युग से जुड़ा है। सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में जब मुगल सत्ता से लोहा लेने वाले बंगाल के बारह सामंत-नायक प्रसिद्ध हुए, उनमें यशोर-राज्य के राजा प्रतापादित्य का नाम अग्रणी है। अनुश्रुति है कि प्रतापादित्य यशोरेश्वरी को अपनी अधिष्ठात्री मानते थे — उनके संरक्षण में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और देवी राज्य की रक्षा-देवी मानी गईं। प्रताप के उत्थान-पतन की गाथा — साहस, विद्रोह और अंत — बंगाल की लोक-स्मृति का प्रिय आख्यान है; और उस पूरी गाथा की मौन साक्षी यशोरेश्वरी रहीं। राज्य गया, राजा गए — देवी वहीं हैं।

कालांतर में यह अंचल विभाजन की रेखा के उस पार गया, और यशोरेश्वरी बांग्लादेश के हिंदू समाज की — विशेषतः सातखीरा-खुलना अंचल की — श्रद्धा-धुरी बनीं। कठिन दशकों में भी स्थानीय समाज ने पूजा की निरंतरता रखी; मंदिर आधुनिक काल में अंतरराष्ट्रीय ध्यान में भी आया, जब राष्ट्राध्यक्षों-शासनाध्यक्षों की तीर्थ-भेंटों ने इस प्राचीन पीठ को विश्व-समाचारों में स्थान दिलाया। प्रवासी बंगाली हिंदू समाज दूर देशों से इस पीठ की सेवा-परंपरा से जुड़ा रहता है — मानो हथेलियों की देवी के लिए असंख्य हथेलियाँ जुड़ गई हों।

पर्व-परंपरा में काली पूजा यहाँ का महापर्व है — दीपान्विता की रात ईश्वरीपुर दीपों से जगमगाता है; दुर्गापूजा, नवरात्र और प्रत्येक अमावस्या की तिथियाँ विशेष हैं। मंगलवार-शनिवार की साप्ताहिक पूजा में आसपास के गाँवों की स्त्रियों की उपस्थिति इस पीठ की लोक-जड़ों की गवाही है। सुंदरवन-अंचल की साझी लोक-धार्मिकता — जहाँ बनबीबी और दक्षिण राय की कथाएँ हिंदू-मुसलमान दोनों समाजों में चलती हैं — के बीच यशोरेश्वरी शाक्त परंपरा की दीपशिखा हैं।

🎉 परंपरा, पर्व और भाव

सुंदरवन-अंचल के जीवन में देवी-स्मरण अस्तित्व की रीति है — मधु-संग्राहक, काठ-हारे और मछुआरे वन-नदी में उतरने से पहले अपने-अपने रक्षक देवों को प्रणाम करते हैं, और शाक्त परिवारों की वह वंदना यशोरेश्वरी तक पहुँचती है। काली पूजा के मेले में ईश्वरीपुर का प्रांगण ग्रामीण शिल्प, मिठाई और कीर्तन-मंडलियों से भर उठता है; स्थानीय पूजा-समितियों की सेवा-व्यवस्था पीढ़ियों से इस आयोजन को सँभालती आई है। हथेलियों की देवी के आँगन में जुटे ये असंख्य श्रमजीवी हाथ ही इस पीठ की सबसे सच्ची पूजा-सामग्री हैं।

यशोरेश्वरी पीठ की कथा का सार करतल में है: हाथ जोड़ना और हाथ बढ़ाना — दोनों पूजा हैं। जुड़े हाथ प्रणाम करते हैं, बढ़े हाथ सहारा देते हैं; देवी को दोनों प्रिय हैं। जिस भूमि पर माँ की हथेलियाँ उतरीं, वहाँ का इतिहास साक्षी है कि राजाओं के दुर्ग ढह गए, पर जुड़े हाथों की परंपरा नहीं ढही। यशोर की ईश्वरी अपने भक्तों से यही कहती हैं — मेरा हाथ तुम्हारे सिर पर है; अब तुम्हारा हाथ किसी और के सिर पर हो।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

यशोर (बांग्लादेश) की पीठ-परंपरा; राजा प्रतापादित्य के संरक्षण की ऐतिहासिक स्मृति।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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