सनातन ज्ञान
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मंत्र एवं स्तुतियाँ

ॐ सह नाववतु

गुरु/शांति · शांति मंत्र

उपनिषद् स्रोतगुरु/शांतिशांति मंत्र

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

📖 भावार्थ

ईश्वर गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा तथा पोषण करें। हम मिलकर शक्ति और उत्साह से अध्ययन करें। हमारा ज्ञान तेजस्वी बने और हमारे बीच द्वेष न हो।

📜 स्रोत

उपनिषद् शांतिपाठ (कठ/तैत्तिरीय परंपरा)

🪔 पाठ-पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें

  • स्वच्छ स्थान और स्वच्छ शरीर — यथासंभव स्नान के पश्चात पाठ करें।
  • शांत मन — कुछ क्षण गहरी श्वास लेकर मन स्थिर करें।
  • श्रद्धा और सम्मान — शब्दों को धीरे, स्पष्ट और भावपूर्वक बोलें।
  • अर्थ समझकर पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है — भावार्थ अवश्य पढ़ें।

कौन पढ़ सकता है?

यह पाठ श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति कर सकता है — स्वच्छता, शांत मन और सम्मानपूर्ण उच्चारण ही मुख्य नियम हैं। विशेष साधना-विधियाँ (बीजमंत्र, दीक्षा, अनुष्ठान) योग्य गुरु-परंपरा से सीखें।

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🪔 महत्त्व व परिचय

"ॐ सह नाववतु" एक उपनिषद्-स्रोत शांति-मंत्र है, जो गुरु-शिष्य परंपरा में साथ मिलकर अध्ययन करने, साथ मिलकर तेजस्वी ज्ञान प्राप्त करने और परस्पर द्वेष-रहित रहने की प्रार्थना करता है। यह मंत्र प्रायः किसी भी वैदिक अध्ययन-सत्र या पाठशाला के आरंभ में पढ़ा जाता है, जिससे गुरु और शिष्य दोनों के बीच सामंजस्य और सम्मान का भाव स्थापित हो।

🕰️ कब और कैसे

इस परंपरा के अनुसार यह मंत्र किसी अध्ययन-सत्र, कक्षा या शास्त्र-चर्चा के आरंभ में शांति-पाठ के रूप में पढ़ा जाता है, ताकि शिक्षक और विद्यार्थी दोनों में सद्भाव और एकाग्रता बनी रहे।

🙏 आध्यात्मिक भाव

इसका भाव है सहयोग और सम्मान के साथ ज्ञान-यात्रा — यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान द्वेष या प्रतिस्पर्धा से नहीं, परस्पर सम्मान और सहयोग से प्राप्त होता है।

प्रश्नोत्तर

यह मंत्र कब पढ़ा जाता है?

प्रायः किसी वैदिक अध्ययन-सत्र, कक्षा या शास्त्र-चर्चा के आरंभ में शांति-पाठ के रूप में।

क्या यह मंत्र केवल गुरुकुल-परंपरा के लिए है?

नहीं, आधुनिक शिक्षण-संस्थानों में भी शांति-पाठ के रूप में इसका प्रयोग प्रचलित है।

इस मंत्र का मुख्य संदेश क्या है?

यह गुरु-शिष्य के बीच सामंजस्य, सम्मान और द्वेष-रहित सहअध्ययन की भावना व्यक्त करता है।

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