मधुराष्टकम्
श्रीकृष्ण · अष्टकम्
अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं, गमनं मधुरं, मधुराधिपतेरखi लं मधुरम् ।।१।। वसनं मधुरं, चरितं मधुरं, वचनं मधुरं वलितं मधुरम्, चलितं मधुरं, भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।।२।। वेणर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ, नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।३।। गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्, रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।४।। करणं मधुरं, तरणं मधुरं, हरणं मधुरं, रमणं मधुरम्, वमितं मधुरं, शमितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।५।। गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा, सलिलं मधुरं, कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।६।। गोपी मधुरा लीला मधुरा, राधा मधुरा मिलनं मधुरम्, दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।७।। गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा, दलितं मधुरं, फलितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।८।।
📖 भावार्थ
महाप्रभु वल्लभाचार्य-परंपरा में प्रसिद्ध, श्रीकृष्ण की मधुरता का अष्टकम् ("अधरं मधुरं…")
📜 स्रोत
मूल पाठ स्रोत: संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org), CC BY-SA 4.0 — पाठ अपरिवर्तित लिया गया
🪔 पाठ-पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें
- ✦स्वच्छ स्थान और स्वच्छ शरीर — यथासंभव स्नान के पश्चात पाठ करें।
- ✦शांत मन — कुछ क्षण गहरी श्वास लेकर मन स्थिर करें।
- ✦श्रद्धा और सम्मान — शब्दों को धीरे, स्पष्ट और भावपूर्वक बोलें।
- ✦अर्थ समझकर पाठ करना अधिक फलदायी माना गया है — भावार्थ अवश्य पढ़ें।
कौन पढ़ सकता है?
यह पाठ श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति कर सकता है — स्वच्छता, शांत मन और सम्मानपूर्ण उच्चारण ही मुख्य नियम हैं। विशेष साधना-विधियाँ (बीजमंत्र, दीक्षा, अनुष्ठान) योग्य गुरु-परंपरा से सीखें।
🔗 संबंधित मंत्र-स्तुतियाँ
🪔 महत्त्व व परिचय
मधुराष्टकम् एक आचार्य-रचित स्तोत्र माना जाता है, जो श्रीकृष्ण के हर अंग, कर्म और संबंध को "मधुर" (मधुरता से परिपूर्ण) कहकर स्तुति करता है। यह वल्लभ-संप्रदाय की परंपरा से जुड़ी रचना मानी जाती है और कृष्ण-भक्ति के "माधुर्य-भाव" — अर्थात प्रेम-प्रधान भक्ति — का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी शैली अत्यंत काव्यात्मक और भावुक मानी जाती है।
🕰️ कब और कैसे
इस परंपरा के अनुसार मधुराष्टकम् प्रातः पूजा में, विशेषकर वल्लभ-संप्रदाय अनुयायियों द्वारा, श्रद्धा और भाव-विभोर होकर पढ़ा जाता है। शांत मन और लय पर ध्यान इसे अधिक सार्थक बनाता है।
🙏 आध्यात्मिक भाव
इसका भाव है सर्वत्र मधुरता का दर्शन — यह सिखाता है कि श्रद्धा की दृष्टि से देखने पर जीवन का हर पक्ष सुंदर और अर्थपूर्ण प्रतीत हो सकता है।
❓ प्रश्नोत्तर
मधुराष्टकम् किस परंपरा से जुड़ा है?
यह वल्लभ-संप्रदाय की भक्ति-परंपरा से जुड़ी रचना मानी जाती है।
क्या इसे कोई भी पढ़ सकता है?
हाँ, यह किसी संप्रदाय-विशेष तक सीमित नहीं, श्रद्धा रखने वाला कोई भी पढ़ सकता है।
क्या इसका भाव समझना कठिन है?
भाव सरल है — हर वस्तु में मधुरता देखना; संस्कृत शब्दों का हिंदी भावार्थ इसे और सुगम बनाता है।