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दीर्घ पाठ

सुंदरकांड

श्रीरामचरितमानस — पंचम सोपान

गोस्वामी तुलसीदासअवधी386 पंक्तियाँ⏱ लगभग 1.5–2 घंटे

श्रीरामचरितमानस का पाँचवाँ सोपान, जिसमें हनुमानजी की समुद्र-लंघन से लेकर लंका-दहन और श्रीराम के पास लौटने तक की कथा है। यह मानस का एकमात्र काण्ड है जिसका पाठ स्वतंत्र रूप से भी व्यापक रूप से किया जाता है — इसीलिए इसे यहाँ अलग पाठ के रूप में रखा गया है।

अक्षर का आकार

श्री रामचरितमानस

॥ श्री सुंदरकाण्ड ॥

श्लोक शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।

रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥१॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।

भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥२॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥३॥2

चौपाई जामवंत के बचन सुहाए।

सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।

सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

जब लगि आवौं सीतहि देखी।

होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।

चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।

कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥

बार-बार रघुबीर सँभारी।

तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।

चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। 3 एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।

तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

दोहा हनुमान तेहि परसि कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥१॥

चौपाई जात पवनसुत देवन्ह देखा।

जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।

पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्हा अहारा।

सुनत बचन कह पवनकुमारा॥

राम काजु करि फिरि मैं आवौं।

सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

तब तव बदन पैठिहउँ आई।

सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥

जबहिं जतन देइ कहुँ सो न पावा।

ग्रससि न मोहि कहुँ बहुत बढ़ावा॥

योजन भरि तेहिं बदनु पसारा।

कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।

तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।

तासु दून कपि रूप देखावा॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना॥

बदन पैठि पुनि बाहेर आवा।

मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥4

दोहा मोहि कपट कपि नहिं तव पावा।

राम काजु सबु करिहहु आवा॥

धनि धनी जननी धनि कपि राया।

तुम्हहि देव सब करहिं सहाया॥२॥

चौपाई (लंका प्रवेश) निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।

करि माया नभु के खग गहई॥

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।

जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।

एहि बिधि जीव खाइ उपजाई॥

सोइ छल हनुमान कहूँ कीन्हा।

तासु कपट कपि तुरतहिं चीन्हा॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।

बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा।

गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

नाना तरु फल फूल सुहाए।

खग मृग बृंद देखि मन भाए॥

शैल बिसाल देखि एक आगें।

ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई।

प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥

गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।

कहि न जाइ कल दुर्ग बिसेषी॥

अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा।

कनक कोट कर परम प्रकासा॥

दोहा कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥

चौपाई (लंकिनी प्रसंग) नाम लंकिनी एक निसिचारी।

सो कह चलसि कहाँ मोहि मारी॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।

मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥

मुष्टिका एक कपि हनि बोरा।

रुधिर वमत धरनीं ढनकोरा॥

पुनि संभारि उठी सो लंका।

जोरि पानि कर विनय संसका॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।

चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥

बिकल होसि तैं कपि के मारे।

तब जानेसु निसिचर संघारे॥

तात मोर अति पुन्य बहूता।

देखेउँ नयन राम कर दूता॥

दोहा तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तुल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥३॥

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।

हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।

गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

चौपाई (विभीषण भेंट) रामायुध अंकित गृह सोहा।

कपिहि हरष अतिसय मन मोहा॥

रामा नाम लिखि अंकित चापा।

देखि पवनसुत मन अकुलापा॥

लंका निसिचर निकर निवासा।

इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥

मन महुँ तर्क करै कपि लागा।

तेही समय बिभीषनु जागा॥

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।

हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।

साधु ते होइ न कारज हानी॥

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।

सुनत बिभीषनु उठि तहँ आए॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।

बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ प्रीतम।

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी॥

दोहा तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

सुनत देह पुलकित भई मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥४॥

चौपाई (विभीषण का विलाप और हनुमान जी का सांत्वना देना) सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।

जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।

करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥

तामस तनु कछु साधन नाहीं।

प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥

अब मोहि भा भरोस हनुमंता।

बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।

तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।

करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥

चौपाई (अशोक वाटिका और सीता दर्शन) जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।

चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।

बन असोक सीता रह जहवाँ॥

देखि मनहि मन कीन्ह प्रनामा।

बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥

कृश तनु सीस जटा एक बेनी।

जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥

निज पद नयन दिएँ मन लीना।

राम चरन रति दीन मलीना॥

देखि परम दुखि भयउ कपिराज।

प्रभु प्रताप सुमिरत सब काज॥

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई।

करइ बिचार करौं का भाई॥

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।

संग नारि बहु किएँ बनावा॥

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।

साम दान भय भेद देखावा॥

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।

मंदोदरी आदि सब रानी॥

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।

एक बार बिलोकु मम ओरा॥

तृण धरि ओट कहति बैदेही।

सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।

कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥

अस कहि फिरीं उलटि मुख कीन्हा।

रघुपति चरन चित्त तेहिं दीन्हा॥

दोहा कपि करि हृदयँ बिचारु दीन्हि मुद्रिका डारि तब।

जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥१२॥

चौपाई (हनुमान-सीता भेंट) तब देखी मुद्रिका मनोहर।

राम नाम अंकित अति सुंदर॥

चकित चितव मुदरी पहिचानी।

हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥

जीति को सकइ अजय रघुराई।

माया तें असि रचि नहिं जाई॥

हृदयँ बिचार करति जेहि काला।

कपि मृदु बचन कहेउ तेहि काला॥

रामचंद्र गुन बरनैं लागा।

सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥

लगीं सुनैं श्रवन मन लाई।

आदिहु तें सब कथा सुनाई॥

श्रवनामृत जेहिं कथा सुनाई।

कहि सो प्रगट होति किन भाई॥

तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।

फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥

राम दूत मैं मातु जानकी।

सत्य सपथ करुनानिधान की॥

यह मुद्रिका मातु मैं आनी।

दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥

दोहा कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।

जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३॥

चौपाई (अशोक वाटिका विध्वंस) मातु मोहि अति भूख लानी।

देखि सुंदर फल मन लोभानी॥

जौ तुम्ह सुख मानो हनुमंता।

रजनीचर कपि कुल के अंता॥

देखि बुद्धि बल मातु सुजाना।

रघुपति चरन सीस कपि नावा॥

चलेउ हरषि फल खायउ तोरेउ।

रच्छक मरि मरि महि सोरेउ॥

बहुतक मारेसि बहुतक बिदारे।

कछु जाइ पुकारे रावन द्वारे॥

नाथ एक आवा कपि भारी।

तेहिं असोक बाटिका उजारी॥

खाए फल अरु बिटप उपारे।

रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥

सुनि रावन पठए भट नाना।

तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥

सब निसिचर कपि डारे मर्दी।

कछु जाइ पुकारे त्राहि-त्राहि करदी॥

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा।

चला संग लै सुभट अपारा॥

आवत देखि बिटप गहि तर्जा।

ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥

दोहा कछु मारे कछु मर्दित कछु मिलि गए पुकार।

नाथ एक कपि भारी सब दल कीन्ह उजार॥१८॥

चौपाई (मेघनाद-हनुमान युद्ध और ब्रह्मपाश) सुत बध सुनि रावन अकुलानी।

पठयउ मेघनाद बलवानी॥

मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।

देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥

चला इन्द्रजित अतुलित जोधा।

बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥

कपि देखा दारुन भट आवा।

कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥

अति बिसाल तरु एक उपारा।

बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥

रहे महाभट ताके संगा।

गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥

पुनि संधानि कीन्ह मखारी।

तब हनुमंत हृदयँ बिचारी॥

ब्रह्म अस्त्र तेहिं सांधा कपि मन कीन्ह बिचार।

जौ न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥

ब्रह्मपाश कपि हनुमंतही मारा।

परतिहुँ बार कटक संघारा॥

तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।

नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥

जासु नाम जपि सुनहु भवानी।

भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥

तासु दूत की बंधु तरु आवा।

प्रभु कारज लगि आपु बँधावा॥

दोहा कपि बंधन सुनि निसिचर धाए कौतुक लागि।

अधम सभाँ पगि गयउ जहाँ दसानन पागि॥१९॥

चौपाई (रावण-हनुमान संवाद) कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा।

कहि दुर्बाद उपजि अति रिसा॥

कहि लंकेश कवन तैं कीसा।

केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥

की तुम्ह श्रवन सुनी नहिं मोरी।

बारिधि पार गएहु मति भोरी॥

की तव प्रान प्रिया अति ताते।

मोरे नगर आएहु केहि नाते॥

सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।

पाइ जासु बल रचित माया॥

जाके बल बिरंचि हरि ईसा।

पालत सृजत हरत दससीसा॥

जा बल सीस धरत सहसानन।

अंड कोस समेत गिरि कानन॥

धरेउ जो बिबिध देह सुरत्राता।

तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥

हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।

तेहि के दूत हम कर कुरुपंजा॥

दोहा राम चरन पंकज उर धरि लंका आयउँ तात।

सुनु रावन अब तजि मद करहु राम पद नेह॥२२॥

चौपाई (लंका दहन की तैयारी) सुनत बचन बिहसा अति रावन।

कपिहि सिखावन आव सुहावन॥

मृत्यु निकट आई सठ तोरे।

कहसि बचन अब मुहि मुख मोरे॥

कपि को कहा बेगि करहु दंड।

जासु दूत यह अति प्रचंड॥

बिभीषन तब अति बिनय सुनाई।

नीति बिरोध न मारिअ भाई॥

कहा रावन तब सठ कपि का।

अंग भंग करि पठइअ बाका॥

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥

पूँछ हीन कपि जाइहि तब निज प्रभुहि देखाइ।

तब सठ बचन कहिहि सुनि प्रभुहि मोहि बोलाइ॥

चौपाई (लंका दहन) पावक जरत देखि हनुमंता।

भयउ परम लघु रूप तुरंता॥

चढ़ि अटारिन्ह कनक कोट पर।

गरजा कपि अति सबद भयंकर॥

देइ डगरि कटकट कपि नादा।

चलेउ पवनसुत किएँ प्रसादा॥

कनक कोटि मनि खचित सँवारा।

कपि अकुलान भयउ जनु जारा॥

हरषत सब देवन्ह जय बोली।

रावन गृह जनु अति अकोली॥

एक बिभीषन को गृह छोरा।

पावक जरइ न तासु निहोरा॥

उलटि पलटि लंका सब जारी।

कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

दोहा लंका उलटि जलाइ करि कूदि परा सिंधु महुँ जाय।

पूँछ बुझाइ खोई श्रम धरि लघु रूप बहोरि॥२६॥

चौपाई (सीता जी से विदा और चूड़ामणि देना) गयउ मातु पाहीं सिरु नावा।

बहुत भाँति समुझाई सुनावा॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।

जैसे रघुबर मोहि दीन्हा॥

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।

हरष समेत पवनसुत लयऊ॥

कहेहु तात अस मोर प्रनामा।

सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥

दीनदयाल बिरिदु संभारी।

हरहु नाथ मम संकट भारी॥

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु।

बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥

मास दिवस महुँ नाथु न आवा।

तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।

तुम्हहू तात चलत अब जाना॥

देखि परम बिरहाकुल सीता।

बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥

मातु न करहु बिषाद मन माहीं।

राम की आन कहउँ सचु पाहीं॥

दोहा हनुमान चलत माता सौं कहा बचन सिरु नाइ।

राम कृपाँ प्रभु काजु सबु करिहहिं बेगि आइ॥३१॥

चौपाई (वापसी और राम-हनुमान मिलन) चलेउ पवनसुत गर्जत भारी।

सुनि गर्जन निसिचर भइ झारी॥

नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।

सब कपिन्ह कहुँ हरष सुनावा॥

मिले सकल कपि अति हरषाने।

जनु नव देह पाए सब प्रानें॥

चले हरषि रघुनायक पाहीं।

करत बखान करत मन माहीं॥

आए निकट बिभीषन भाई।

कपि दल सहित राम पहि आई॥

नावा माथ राम पद पंकज।

रोमहूँ पुलक नयन जल नीरद॥

राम पूछि तब कुसल सुहाई।

कहहु तात सीता कइ ताई॥

नाथ कुसल सब भाँति सुहावनी।

जासु प्रभु तुम्ह दयाल सुख दानी॥

दोहा सुनत राम कपि बचन तब दीन्हि परस प्रभु हाथ।

पुनि-पुनि कपिहि उठावहिं हृदयँ लगावन नाथ॥३२॥

चौपाई (हनुमान जी द्वारा सीता जी की दशा का वर्णन) कहहु तात केहि भाँति जानकी।

रहति करति रच्छा सुभ प्रान की॥

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही।

रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥

तात कहहु असि सीता बाता।

राम कृपाँ रच्छक जग त्राता॥

सुनु प्रभु सीता कै दुख रासी।

कहि न सकहिं जिहवा सहसासी॥

अब बिलंबु केहि कारन कीजे।

कपि दल साजि कटक चलि दीजे॥

सुनत बचन प्रभु हरष बिसेषी।

चले सकल कपि प्रभुहि निमेषी॥

चौपाई (श्री राम का क्रोध और समुद्र की विनती) बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

5लछिमन बान सरासन आनू।

सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।

सहज कृपन सन सुंदर नीती॥

ममता रत सन ग्यान कहानी।

अति लोभी सन बिरति बखानी॥

क्रोधहि सम बिषयहि हरि कथा।

ऊसर बीज बएँ फल जथा॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।

यह मत लछिमन के मन भावा॥

संधानिय प्रभु बिसिख कराला।

उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

मकर उरग झष गन अकुलाने।

जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥

कनक थार भरि मनि गन नाना।

बिप्र रूप आयउ तजि माना॥

दोहा काटेहिं पय कदरी मृदु पारस पाएँ ईख।

बिनय न मानत खग पति कहि सुनि बिगत अलीक॥५८॥6

चौपाई (समुद्र का शरणागत होना और सेतु का उपाय) सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।

छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥

गगन समीर अनल जल धरनी।

इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥

तव प्रेरित मायाँ उपजाए।

सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥

प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही।

मरजादा पुनि तुम्हारी कीन्ही॥

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।

सकल ताड़ना के अधिकारी॥

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।

उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥

प्रभु अग्या अपैल श्रुति गाई।

करौ सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥

सुनत बिनीत बचन सुख पाए।

बिहसि राम अति नीति दिखाए॥

अब सोइ करहु जेहि बिधि बल सोहा।

तत छन सिंधु प्रभु सन मोहा॥

चौपाई (नल-नील का प्रसंग) नाथ नील नल कपि द्वौ भाई।

लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥

तिन्ह के परस किएँ गिरि भारी।

तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारी॥

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई।

करिहउँ बल मति सहइ सहाई॥

एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ।

जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥

दोहा (सुंदरकांड का समापन) सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०॥

॥ इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः ॥

सावधानी

यह पाठ श्रद्धा और भाव का विषय है। किसी विशेष फल की गारंटी नहीं दी जाती। शुद्ध उच्चारण हेतु किसी जानकार से सीखना सर्वोत्तम है।

स्रोत

मूल पाठ स्वामी द्वारा उपलब्ध कराया गया (PDF) • रचना: गोस्वामी तुलसीदास (सार्वजनिक डोमेन) • निष्कर्षण के बाद केवल पृष्ठ-संख्या व बाहरी विज्ञापन-पंक्तियाँ हटाई गईं; पद्य-पाठ अपरिवर्तित है