ब्रह्म सूत्र
वेदांत दर्शन का आधार ग्रंथ
पढ़ने का समय
30 मिनट
सूत्र
555
अध्याय
4
कर्ता
बादरायण
एक मिनट में समझें
ब्रह्म सूत्र बादरायण द्वारा लिखा गया वेदांत दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें 555 सूत्र हैं जो 4 अध्यायों में बँटे हैं। यह ग्रंथ उपनिषदों की शिक्षाओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है और यह सिद्ध करता है कि ब्रह्म ही सब कुछ है, और सब कुछ ब्रह्म में है।
मुख्य विषय:
- ✓ ब्रह्म का स्वरूप और विशेषताएं
- ✓ जगत की उत्पत्ति और ब्रह्म का संबंध
- ✓ आत्मा और परमात्मा की एकता
- ✓ मुक्ति का मार्ग और उपाय
आगे क्या पढ़ें
📖 परिचय — ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र, जिसे वेदान्तसूत्र भी कहा जाता है, वेदान्त दर्शन (उत्तर-मीमांसा) का मूल आधार-ग्रंथ है, जिसकी रचना महर्षि बादरायण (जिन्हें परंपरा में वेदव्यास से भी जोड़ा जाता है) ने की। यह चार अध्यायों में 555 सूत्रों में विभाजित है, जिनका उद्देश्य उपनिषदों के प्रतीत होने वाले परस्पर-विरोधी वाक्यों का व्यवस्थित समन्वय करना है। पहला सूत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (अब अतः ब्रह्म की जिज्ञासा) से यह ग्रंथ आरंभ होता है, जो पाठक को सीधे ब्रह्म-अन्वेषण की दिशा में प्रवृत्त करता है। ब्रह्मसूत्र इतना संक्षिप्त है कि इसे बिना भाष्य के समझना कठिन है — इसी कारण आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य सहित अनेक आचार्यों ने इस पर अपने-अपने भाष्य लिखे, और इन्हीं भाष्यों से अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत जैसी वेदान्त-परंपराओं का जन्म हुआ। यही कारण है कि ब्रह्मसूत्र को वेदान्त-परंपरा की साझी नींव कहा जा सकता है — एक ही सूत्र-ग्रंथ, पर अनेक दार्शनिक भवन उस पर खड़े हुए।
🔑 मुख्य बातें
- ब्रह्मसूत्र वेदान्त दर्शन (उत्तर-मीमांसा) का मूल ग्रंथ है, जिसकी रचना महर्षि बादरायण ने की।
- यह चार अध्यायों में 555 सूत्रों में विभाजित है।
- प्रथम सूत्र "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" से ब्रह्म-अन्वेषण की दिशा तय होती है।
- इसकी अत्यधिक संक्षिप्तता के कारण भाष्य के बिना इसे समझना कठिन माना जाता है।
- आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य आदि के भाष्यों से अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत जैसी परंपराएँ जन्मीं।
🕉️ वेदान्त दर्शन का पूरा परिचय — प्रमुख परंपराएँ (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आदि) सहित — देखें।
विस्तार से पढ़ें →❓ प्रश्नोत्तर
ब्रह्मसूत्र की रचना किसने की?
परंपरा में इसकी रचना महर्षि बादरायण से जुड़ी है, जिन्हें कई परंपराओं में वेदव्यास से भी संबद्ध माना जाता है।
ब्रह्मसूत्र पर इतने अलग-अलग भाष्य क्यों हैं?
सूत्र अत्यंत संक्षिप्त हैं, इसलिए हर आचार्य ने अपनी दार्शनिक दृष्टि के अनुसार उनकी व्याख्या की — इन्हीं भाष्यों से अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत जैसी परंपराएँ विकसित हुईं।
ब्रह्मसूत्र के चार अध्यायों में क्या विषय हैं?
समन्वय (उपनिषद-वाक्यों का समन्वय), अविरोध (आपत्तियों का निराकरण), साधन (साधना-मार्ग) और फल (मुक्ति-स्वरूप) — यही चार अध्याय-विषय हैं।